पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३७५

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३८० विनय-पत्रिका बस, अब, तुलसीदास आपके नामका पुतला* बाँधेगा, क्योंकि मुझसे अब इतना उपहास सहन नहीं होता ॥ ५॥ [२४२] तुमसम दीनबंधु, न दीन कोउ मो सम, सुनहु नृपति रघुराई। मोसमकुटिल-मौलिमनिनहिं जगतुमसमहरि!नहरनकुटिलाई॥ ही मन-वचन-कर्म पातक-रत, तुम कृपालु पतितन-गतिदाई। हौ अनाथ, प्रभु! तुम अनाथ-हित,चित यहि सुरतिकबहुँनहिं जाई ।। ही आरत, आरति-नासक तुम, कीरति निगम पुराननि गाई। हो सभीत तुम हरन सकल भय, कारन कवन कृपा विसराई ॥३॥ तुम सुखधाम राम श्रम-भंजन, हो अति दुखित त्रिविध श्रम पाई। यह जिय जानि दास तुलसीकहँ राखहु सरनसमुझि प्रभुताई ॥४॥ भावार्थ-हे महाराज रामचन्द्रजी । आपके समान तो कोई दीनोंका कल्याण करनेवाला बन्धु नहीं है और मेरे समान कोई दीन नहीं है । मेरी बराबरीका ससारमें कोई कुटिलोंका शिरोमणि नहीं है और हे नाथ | आपके बराबर कुटिलताका नाश करनेवाला कोई नहीं है ॥ १ ॥ मैं मनसे, वचनसे और कर्मसे पापोंमें रत हूँ और हे कृपालो। आप पापियोंको परमगति देनेवाले हैं । मैं अनाथ है और हे प्रभो। आप अनार्थीका हित करनेवाले हैं। यह बात जब नटोको खेल दिखानेपर कुछ नहीं मिलता, तब वे कपड़ेका पुतला बनाकर बाँसपर लटकाये हुए कहते फिरते हैं कि देखो यह कैसा अनुदार है। इससे लजित होकर उसको कुछ-न-कुछ दे ही देता है। इसी तरह मैं भी एक पुतला बनाकर लिये फिरूँगा । लोग पूछेगे तो यही उत्तर देगा कि यह अयोध्याधिप महाराज श्रीरामचन्द्रजी हैं। इससे आपको लाज लगेगी तब आप ही अपनार्वेगे।