पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/३९२

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३९७ विलय-पत्रिका नियम है कि बिना साधे वे सिद्ध नहीं होते, इससे ( अब तो) है कृपानिधे ! आपकी एक कृपा ही ऐसी अनूठी है, जो मेरी बिगडी बातको बना देगी। ( आपकी कृपासे ही मुझ साधनहीनका सुधार हो सकता है) ॥२॥ आप पापियोंको पवित्र करनेवाले, दुखियों और अनाथोंके हितू, निराधारोंके आधार, दीनोंके बन्धु और (स्वाभाविक ही) दयालु हैं । किन्तु मैं तो इनमेंसे एक भी नहीं हूँ ( अहकारके मारे मैंने अपनेको कभी पतित, दुखी, दीन, अनाथ और निराधार माना ही नहीं। तब फिर आप इनके नाते मुझपर क्यों कृपा करेंगे। न तो मैंने विवेकसे अपने शत्रुओं ( काम, क्रोध, लोभ, मोह ) के ही साथ युद्ध किया और न उनपर विजय ही प्राप्त की। इसीसे मैं दैहिक, भौतिक और दैविक-इन तीनों तापोंसे जल रहा हूँ, जैसा बोया वैसा ही काट रहा हूँ। (किसे दोष ?)॥३॥ मेरा खॉग तो सीधे-सादे साधुका-सा है, पर पाप करनेमे मैं कलियुगसे भी बढ़ा हुआ हूँ। मेरी बुद्धिको परलोककी ( भगवत्सम्बन्धी) बातें फीकी लगती हैं और वह संसारके रगमें रंगी हुई है ( वह केवल विषय-भोगोंके पाने-न-पानेकी उलझनमें फंसी रहती है। हे महाराज! इस बड़े भारी दुष्ट समाजके साथ आजतक जितने दिन बीते सो तो व्यर्थ चले ही गये, अब किसी-न-किसी तरह आपके नामका सहारा लिया है।॥ ४॥ हे श्रीरामजी! आप भलीभाँति जानते हैं कि आपके नामका कैसा प्रताप है! (न मालूम मुझ-सरीखे कितने नामके प्रतापसे तर चुके हैं)। मेरे लिये तो सिवा आपके नामके विधाताने दूसरी गति ही नहीं रची है। आपको असन्तुष्ट करनेके लायक मेरे करोड़ों ककर्म हैं, किन्तु सन्तुष्ट करने लायक तो मेरी एक निर्लज्जता ही है। (मेरी निर्लजतापर हीप्रसन्न होकर कृपा कीजिये)५