पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४३८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


४४३ परिशिष्ट दिन ग्रहण भी था। बेचारा राहु जब सूर्यको ग्रहण करनेके लिये आया तो देखा चारों ओर अन्धकार है और सूर्यका कहीं पता नहीं। इससे निराश होकर वह इन्द्रके पास पहुंचा और गिडगिडाने लगा कि आज मैं क्या खाऊँगा। सूर्यको तो किसी दूसरेने खा डाला । यह सुनकर इन्द्र राहुको साथ लिये दौडे । श्रीहनूमान्जीने जब उन दोनोंको आते देखा तो वे उनको भी खानेके लिये लपके। इसपर इन्द्रने उनकी ठुड्डीपर ऐसा वज्र मारा कि हनूमान् मूछित हो गये और वज्र भी टूट गया। तभीसे महावीरजीका हनुमान् नाम पडा। रुद्र-अवतार-- । एक बार शिवजीने श्रीरामचन्द्रजीकी स्तुति की और यह वर मॉगा कि हे प्रभो ! मैं दास्यभावसे आपकी सेवा करना चाहता हूँ इसलिये कृपया मेरे इस मनोरथको पूर्ण कीजिये ।' श्रीरामचन्द्रजीने 'तथास्तु' कहा। वही शिवजी श्रीरामावतारमें हनूमान्के रूपमें अवतीर्ण होकर श्रीरामचन्द्रजीके सेवकोंमें प्रमुख पदको प्राप्त हुए। सुग्रीव-सिच्छादि-रच्छन-निपुन- श्रीहनूमान्जीने सूर्यनारायणसे शस्त्रास्त्र-विद्याकी शिक्षा पायी थी। इसकी दक्षिणाके स्थानमें श्रीसूर्यनारायणने हनूमान्जीसे कहा था कि 'देखो, हमारे पुत्र सुग्रीवकी तुम सदा रक्षा करना ।' हनूमान्जीने आजन्म सुग्रीवकी रक्षा की । वालि-बलशालि-वध-मुख्यहेतू-- सीताहरणके बाद जब भगवान् श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मण सीताको ढूंढते-ढूंढ़ते ऋष्यमूक पर्वतके समीप पहुँचे तो पहले