पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४४६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


४५१ - परिशिष्ट माँग ।। उसने यह वर माँगा कि 'हे प्रभो ! मुझे आपकी अनन्य भक्ति प्राप्त हो ।' यह कया 'शिवपुराण' में है। दच्छ-मख- दक्ष प्रजापतिकी एक कन्याका नाम सती था, उसका विवाह शिवजीके साथ हुआ था। एक बार ब्रह्माकी सभामें सब देवता विराजमान थे, वहाँ दक्ष प्रजापति पहुंचे। उनकी अभ्यर्थनाके लिये ब्रह्माके साथ समस्त देवता उठ खड़े हुए, परन्तु शिवजी बैठे ही रह गये । इससे दक्ष प्रजापतिको बड़ा क्रोध हुआ और इन्होंने इसका बदला लेनेके उद्देश्यसे एक यज्ञ किया। उस यज्ञमें शिवजीके अतिरिक्त सब देवता बुलाये गये । जब यह समाचार सतीको मिला तो वह शिवजीकी अनुमतिके बिना ही अपने पिताके घर चली गयी और वहाँ पहुँचकर जब यज्ञमें शिवजीका भाग उसने न देखा तो क्रोधके मारे योगाग्निमें जलकर भस्म हो गयी । यह समाचार सुनकर शिवजीने वीरमदको यज्ञ-विध्वंस करनेके लिये भेजा । वीरभद्रने वहाँ जाकर यज्ञ-विध्वंस किया । ५५-वेदगर्भ"कर्ता- ब्रह्माजीके पुत्र सनकादिने एक बार अपने पितासे पराविधा- सम्बन्धी कुछ प्रश्न पूछे । जब ब्रह्माजी उन प्रश्नोंका यथेष्ट उत्तर न दे सके तो उन्हें अपने ज्ञानपर बड़ा गर्व हुआ । ब्रह्माजीने उनके हृदयकी बात जानकर श्रीविष्णुभगवान्का स्मरण किया और विष्णु- भगवान् वहाँ शीघ्र ही हंसके रूपमें प्रकट हो गये। फिर सनकादिने उस हंससे पूछा कि 'तू कौन है?' इसी प्रश्नपर हंसभगवान्ने सारी पराविधाका सारांश कह सुनाया । उसे सुनकर सनकादिका