पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४४७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


४५२ विनय-पत्रिका अभिमान जाता रहा । निम्बार्कसम्प्रदायवाले इसी हंसभगवान्को अपने सम्प्रदायका आदि आचार्य मानते हैं ५६-भूमि-उद्धरन- सन्ययुगमें हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक दो महाप्रतापी असुर हो गये हैं । यह दोनों भाई थे। हिरण्याक्ष भूमिको चुराकर पातालमें ले गया। भगवान्ने शूकर-रूप धारणकर हिरण्याक्षको मारा और भूमिका उद्धार किया। इससे भगवान् भूमिके उद्धारक माने जाते हैं । इसके सिवा जब-जब इस पृथ्वीपर पापियोंका अत्याचार बढ़ता है और पृथ्वी घबड़ा उठती है, तब-तब भगवान् अवतार लेकर पापियोंका नाश कर भूमिका उद्धार करते हैं। भूधरनधारी- यह कथा तो प्रसिद्ध ही है कि जब भगवान् श्रीकृष्णके कहनेसे व्रजवासियोंने इन्द्रकी पूजा रोक दी तो इन्द्र व्याकुल होकर प्रलय-मेघको लेकर व्रजपर चढ़ आये । सात दिन लगातार मूसला- धार वृष्टि होती रही। उस समय भगवान् श्रीकृष्णने गौओं और गोपियोंकी रक्षाके लिये गोवर्धनपर्वतको कनिष्ठिका-अंगुलीपर उठाकर उसको छाता बनाकर व्रजकी रक्षा की थी । तभीसे भगवान् 'भूधरनधारी' (गिरिधारी) नामसे पुकारे जाते हैं । ५७-वृत्रासुर- वृत्रासुर बडा प्रतापी असुर था । यह असुर होते हुए भी परम भक्त था । इसने इन्द्रके साथ युद्ध करते समय भक्तिका बड़ा ही सुन्दर वर्णन किया है । भागवतमें यह प्रसंग देखने लायक है। इसीके मारनेके लिये देवगण दधीचि ऋषिके पास उनकी हड़ियाँ