पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४८

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४९ विनय-पत्रिका तुम साक्षात् सूर्य हो॥१॥ तुम्हारी जय हो । तुम्हारा जन्म अञ्जनी- रूपी अदिति ( देवमाता) और वानरोंमे सिंहके समान केसरीरूपी कश्यपसे हुआ है। तुम जगत्के कष्टोंको हरनेवाले हो तथा लोक और लोकपालरूपी चकवा-चकवी और कमलोंका शोक नाश करने- वाले साक्षात् कल्याण-मूर्ति सूर्य हो॥ २ ॥ तुम्हारी जय हो । तुम्हारा शरीर बड़ा विशाल और भयंकर है, प्रत्येक अङ्ग वज्रके समान है, भुजदण्ड बड़े भारी है तथा वज्रके समान नख और सुन्दर दाँत शोभित हो रहे हैं। तुम्हारी पूंछ बड़ी लंबी है, शत्रुओंके संहारके लिये तुम अनेक प्रकारके अस्त्र, शस्त्र और पर्वतोंको लिये रहते हो॥ ३॥ तुम्हारी जय हो । तुम श्रीसीताजीके शोक-सन्तापका नाश करनेवाले और श्रीराम-लक्ष्मणके आनन्दरूपी कमलोंको प्रफुल्लित करनेवाले हो। बंदर-स्वभावसे खेलमें ही पूँछसे लंका जला देनेवाले, अशोक-वनको उजाडनेवाले, तरुण तेजके पुंज मध्याह्नकालके सूर्य- रूप हो॥ ४ ॥ तुम्हारी जय हो। तुम समुद्रपर पत्थरका पुल बाँधने- वाले, राक्षसोंके महान् आनन्दके नाश करनेवाले तथा दुष्ट रावण, कुम्भकर्ण और मेघनादके मर्म-स्यानोंको तोडकर उनके कर्मोंका फल देनेवाले हो ॥ ५॥ तुम्हारी जय हो। तुम त्रिभुवनके भूषण हो, विभीषणको राम-भक्तिका वर देनेवाले हो और रणमे श्रीरामजीके साथ बड़े-बड़े काम करनेवाले हो । लक्ष्मण और सीताजीसहित पुष्पक- विमानपर विराजमान सूर्यकुलके सूर्य श्रीरामजीकी कीर्ति-पताका तुम्ही हो ॥ ६ ॥ तुम्हारी जय हो । तुम शत्रुओंद्वारा किये जानेवाले यन्त्र- मन्त्र और अभिचार ( मोहन-उच्चाटन आदि प्रयोगों तथा जादू- ___टोने ) को असनेवाले तया गुप्त मारण-प्रयोग और प्राणनाशिनी वि० प०४-