पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/५३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका जयति धर्मार्थ-कामापवर्गद विभो, ब्रह्मलोकादि-वैभव-विरागी। वचन-मानस-कर्म सत्य-धर्मवती, जानकीनाथ-चरणानुरागी ॥२॥ जयति विहगेश-बलवुद्धि-वेगाति-मद-मथन, मनमथ-मथन, ऊर्ध्वरेता। महानाटक-निपुन, कोटि-कविकुल-तिलक, गानगुण-गर्व-गंधर्व- जेता ॥ जयति मंदोदरी केश-कर्षण, विद्यमान-दसकंठ मठ-मुकुट मानी। भूमिजा दुःख-संजात रोषांतकृत-जातना जंतु कृत जातुधानी ॥४॥ जयतिरामायण-श्रवण-संजात-रोमांच,लोचन,सजल,शिथिलवाणी रामरदपद्म-मकरंद मधुकर,पाहि दासतुलसीशरण,शुलपाणी।५। भावार्थ-हे हनुमानजी । तुम्हारी जय हो । तुम पूर्ण आनन्दके समूह, वानरोंमें साक्षात् केसरी सिंह (ववरशेर ), केशरीके पुत्र और ससारके एकमात्र भरण-पोपण करनेवाले हो । तुम अजनीरूपी दिव्य भूमिकी सुन्दर खानिसे निकली हुई मनोहर मणि हो और भक्तोंके सन्ताप और चिन्ताओंको सदा नाश करते हो ॥१॥ हे विभो ! तुम्हारी जय हो। तुम धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके देनेवाले हो, ब्रह्मलोकतकके समस्त भोग-ऐश्वर्योमें वैराग्यवान् हो । मन, वचन और कर्मसे सत्यरूप धर्मके व्रतका पालन करनेवाले हो और श्रीजानकीनाथ रामजीके चरणोंके परम प्रेमी हो ॥ २ ॥ तुम्हारी जय हो। तुम गरुडके बल, बुद्धि और वेगके बडे भारी गर्वको खर्व करने वाले तथा कामदेवके नाश करनेवाले बाल-ब्रह्मचारी हो। तुम बडे-बडे नाटकोंके निर्माण और अभिनयमे निपुण हो, करोडों महाकवियोंके कुलशिरोमणि और गान-विद्याका गर्व करनेवाले