पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/५४

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विनय-पत्रिका गन्धर्वोपर विजय पानेवाले हो॥३॥ तुम्हारी जय हो। तुम वीरोंके मुकुटमणि, महान् अभिमानी रावणके सामने उसकी स्त्री मन्दोदरीके बाल खींचनेवाले हो । तुमने श्रीजानकीजीके दुःखको देखकर उत्पन्न हुए क्रोधके वश हो राक्षसियोंको ऐसा क्लेश दिया जैसा यमराज पापी प्राणियोंको दिया करता है ॥ ४॥ तुम्हारी जय हो। श्रीरामजीका चरित्र सुनते ही तुम्हारा शरीर पुलकित हो जाता है, तुम्हारे नेत्रोंमे प्रेमके आँसू भर आते हैं और तुम्हारी वाणी गद्गद हो जाती है । हे श्रीरामके चरण-कमल-परागके रसिक भौरे । हे हनुमानरूपी त्रिशूलधारी शिव ! यह दास तुलसी तुम्हारी शरण है, इसकी रक्षा करो ॥५॥ राग सारंग [३०] जाके गति है हनुमानकी। ताकी पैज पूजि आई, यह रेखा कुलिस पषानकी ॥१॥ अघटित-घटन सुघट-विघटन,ऐसीविरुदावलि नहिं आनकी। सुमिरत संकट-सोव-विमोचन, मूरति मोद-निधानकी ॥२॥ तापर सानुकूल गिरिजा, हर, लखन, राम अरु जानकी। तुलसी कपिकी कृपा-विलोकनि, खानि सकल कल्यानकी ॥३॥ भावार्थ-जिसको ( सब प्रकारसे ) श्रीहनुमानजीका आश्रय है, उसकी प्रतिज्ञा पूरी हो ही गयी । यह सिद्धान्त वज्र ( हीरे) की लकीरके समान अमिट है ॥ १ ॥ क्योंकि श्रीहनुमानजी असम्भव घटनाको सम्भव और सम्भवको असम्भव करनेवाले हैं, ऐसे यशका बाना दूसरे किसीका भी नहीं है । श्रीहनुमानजीकी