पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/६०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विनय-पत्रिका और अति दुखीके कहेका बुरा नहीं मानना चाहिये, क्योंकि ये घबराये हुए रहनेके कारण भले-बुरेका विचार करके नहीं बोलते ॥१॥ संसारमें यह प्रत्यक्ष देखा-सुना जाता है कि वर्षा अधिक होने या बिल्कुल न होनेपर व्याकुल हुए स्त्री-पुरुप दैवको गालियाँ सुनाया करते हैं। परन्तु इसका परमेश्वर कोई खयाल नहीं करता ॥ २ ॥ जब कलियुगके कष्ट और भवसागरके भारी भयसे मेरे नाकों दम आ गया, तभी मैं भली-बुरी कह बैठा । अब तुम अपनी भक्तवत्सलताकी ओर देखकर मुझे क्षमा कर दो ॥ ३ ॥ सकटके समय लोग समर्थ और अपने हितकारीको ही याद करते हैं। और वह भी उनके सारे अपराधोंको भुलाकर उनकी सब प्रकारसे रक्षा करता है ॥ ४ ॥ सेवककी भूलोको सदासे खामी ही सुधारते आये हैं। फिर इस तुलसीदासपर तो तुम्हारी एक निराली एवं निश्छल कृपा है ॥ ५॥ [३५] कटु कहिये गाढ़े परे, सुनि समुझि सुसाई । करहिं अनभलेउ को भलो, आपनी भलाई ॥ १॥ समरथ सुभ जो पाइये, वीर पीर पराई । ताहि तके सब ज्यों नदी वारिधि न चुलाई ॥ २ ॥ अपने अपनेको भलो, चहैं लोग लुगाई । भावै जो जेहि तेहि भजै, सुभ असुभ सगाई ॥ ३ ॥ बाँह बोलि दै थापिये, जो निज वरिआई । विन सेवा सो पालिये, सेवक की नाई ॥ ४ ॥ चूक-चपलता मेरियै, तू बड़ो वड़ाई। होत आदरे ढीठ है, अति नीच निचाई ॥ ५॥