पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/८५

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विनय-पत्रिका सुरभ सौरभ धूप दीपवर मालिका । उड़त अघ-विहॅग सुनि ताल करतालिका ॥२॥ भक-हदि-भवन, अज्ञान-तम-हारिनी। विमल विज्ञानमय तेज-विस्तारिनी ॥३॥ मोह-मद-कोह-कलि-कंज-हिमजामिनी । मुक्तिकी दूतिका, देह-दुति दामिनी ॥४॥ प्रनत-जन-कुमुद-बन-इंदु-कर-जालिका । तुलसि अभिमान-महिषेस बहु कालिका ॥ ५॥ भावार्थ-श्रीरामचन्द्रजीकी आरती सब आति-पीडाको हर लेती है। दुःख और पापोंको जला देती है तथा कामनाको जड़से उखाड़- कर फेंक देती है ॥ १ ॥वह सुन्दर सुगन्धयुक्त धूप और श्रेष्ठ दीपकोंकी माला है । आरतीके समय हाथोंसे बजायी जानेवाली तालीका शब्द सुनकर पापरूपी पक्षी तुरत उड़ जाते हैं ॥२॥ यह आरती भक्कोंके हृदयरूपीभवनके अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाली और निर्मल विज्ञानमय प्रकाशको फैलानेवाली है ॥ ३॥ यह मोह, मद, क्रोध और कलियुगरूपी कमलोंके नाश करनेके लिये जाड़ेकी रात है और मुकिरूपी नायिकासे मिला देनेके लिये दूती है तथा इसके शरीरकीचमक बिजलीके समान है ॥ ४ ॥ यह शरणागत भक्तरूपी कुमुदिनीके वनको प्रफुल्लित करनेके लिये चन्द्रमाकी किरणोंकी माला है और तुलसीदासके अभिमान- रूपी महिपासुरका मर्दन करनेके लिये अनक कालिकाओंके समान है ५ हरिशंकरी पद [ ४९ ] देव- दनुज-वन-दहन, गुन-गहन, गोविंदनंदादि-आनंद-दाताऽविनाशी।