पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/८७

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- विनय-पत्रिका आधेमे भगवान् शिवकी स्तुति की गयी है, इसीसे इसका नाम हरि- शकरी है । गोसाईजी महाराजने विष्णु और शिवकी एक साथ स्तुति करके हरि-हरमें अभेद सिद्ध किया है।। ___ भगवान् विष्णु-दानवरूपी वनके जलानेवाले, गुणोंके वन अर्थात् सात्विक सद्गुणों से सम्पन्न, इन्द्रियोंके नियन्ता, नन्द-उपनन्द आदिको आनन्द देनेवाले और अविनाशी हैं। भगवान् शिव-शम्भु, शिव, रुद्र, शंकर आदि कल्याणकारी नामोंसे प्रसिद्ध हैं, बडे भारी भयङ्कर, महान् तेजखी और क्रोधकी राशि हैं ॥ १ ॥ भगवान् विष्णु-अनन्त हैं, छ. प्रकारके ऐश्वर्योसे युक्त हैं, जगतका अन्त करनेवाले, यमकी त्रासको मिटानेवाले, लक्ष्मीजीके खामी और समस्त ब्रह्माण्डको आनन्द देनेवाले है। ___ भगवान् शिव-कैलासके राजा, जगत्के खामी, ईशान, विज्ञानधन और ज्ञान तथा मोक्षके धाम है ॥ २॥ ___भगवान् विष्णु-वामनरूप धरनेवाले, मन-इन्द्रियोंसे अव्यक्त, पवित्र (विकाररहित ) जड-चेतन और लोक-परलोकके स्वामी, साक्षात् परमात्मा और प्रकृतिके खामी हैं। ___भगवान् शिव-मस्तकपर चन्द्रमा और हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले, सृष्टिके सहारकर्ता, पापशून्य, अजन्मा, अमेय, अखण्ड और नन्दीपर सवार होकर चलनेवाले हैं ॥ ३ ॥ भगवान् विष्णु --नीले मेघके समान श्याम शरीरवाले, अनेक '