पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/९२

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विनय-पत्रिका दिया, समुद्रको वाँध लिया, देवताओंके समूहको रावणके बन्धनसे छुड़ा दिया और दस सिर तया विशाल बीस भुजाओंवाले रावणका कुलसहित नाश कर दिया॥ ७॥ देवताओंके शत्रु दुष्ट राक्षसोंके समूहका, जो पृथ्वीपर भाररूप था, संहार करनेके लिये अवतार लेनेमें उपमारहित कारणाले, निर्मल, निर्दोष, अद्वैतरूप, वास्तवमें 'निर्गुण, मायाको साथ लेकर सगुण, परब्रह्म नररूप राजराजेश्वर श्रीरामका मैं स्मरण करता हूँ॥ ८॥ शेषजी, वेद, सरखती, शिवजी, नारद और सनकादि सदा जिनके गुण गाते हैं, परन्तु जिनकी लीलाका पार नहीं पा सकते वही शिवजीके प्यारे अयोध्यानाथ श्रीराम इस तुलसीदासको दु.खरूपी समुद्र से पार उतारनेके लिये सदा-सर्वदा जहाजरूप हैं ॥९॥ [५१] जानकीनाथ,रघुनाथ, रागादि-तम-तरणि, तारुण्यतनु, तेजधाम । सच्चिदानंद, आनंदकंदाकर, विश्व-विश्राम, रामाभिरामं ॥१॥ नोलनव-वारिधर-सुभग-शुभकांति,कटि पीत कौशेयवर वसनधारी रम-हाटक-जटित-मुकुट-मंडित-मौलि, भानु-शत-सदृश उद्योत- कारी ॥२॥ श्रवण कुंडल,भाल तिलक, भ्ररुचिर अति, अरुण अंभोज लोचन विशालं। वक्र-अवलोक, त्रैलोक-शोकापह,मार-रिपु-हृदय-मानस-भरालं ॥३॥ नासिकाचारु सुकपोल,द्विज वज्रदुति, अधर विवोपमा,मधुरहास कंठदर, चिबुकवर, वचन गंभीरतर, सत्य-संकल्प, सुरत्रास-नासं सुमन सुविचित्र नव तुलसिकादल-युतं मृदुल वनमाल उर भ्राजमान।