पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/९७

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विनय-पत्रिका पैरसे सारा ब्रह्माण्डतक नाप लिया । ( नापनेके समय ) आपके चरण-नखसे तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाला (गङ्गा ) जल निकला। आपने वलिको पातालमें भेज और वह राज्य इन्द्रको देकर देवमाता अदितिका दु सह शोक हर लिया ॥५॥ आपने सहस्रबाहु आदि अभिमानी क्षत्रिय राजारूपी हाथियोंके समूहको विदीर्ण करनेके लिये सिंहरूप और ब्राह्मणरूपी धान्यको हरा-भरा करनेके लिये मेघरूप, ऐसा परशुराम-अवतार धारण किया और रामरूपसे दस सिर तथा बीस भुजदण्डवाले रावणको प्रचण्ड बाणोंसे खण्ड-खण्ड कर दिया। ऐसे राजराजेश्वर श्रीरामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ६॥ भूमिके भारी भारको हरनेके लिये आप परमात्मा शुद्ध ब्रह्म होकर भी भक्तोंके लिये मनुष्यरूपधारण करके प्रकट हुए, जो वृष्णिवंशरूपी कुमुदिनीको प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमा, राधाजीके पति और कसादिके क्शरूपी वनको जलानेके लिये अग्निखरूप थे ॥७॥ प्रबल पाखण्ड दम्भसे पृथ्वीमण्डलको व्याकुल देखकर आपने यज्ञादि सम्पूर्ण कर्मकाण्डरूपी जालका खण्डन किया, ऐमे शुद्ध बोधखरूप, विज्ञानधन, सर्व दिव्य- गुण-सम्पन्न, अजन्मा, कृपाल, वुद्धभगवान्की मैं वन्दना करता हूँ॥८॥ कलिकालजनित पापोंसे सभी मनुष्योंके मन मलिन हो रहे है । आप मोहरूपी रात्रि म्लेच्छरूपी धने अन्धकारके नाश करनेके लिये सूर्योदय- की तरह विष्णुयश नामक ब्राहाणके यहाँ पुत्ररूपसे कल्कि अवतार धारण करेंगे। हे नाथ! आप तुलसीदासकी विपत्तिके भारको दूर करे॥९॥ [५३] देव- सकल सौभाग्यप्रद सर्वतोभद्र-निधि, सर्व, सर्वेश, सर्वाभिरामं ।