पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/९८

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विनय-पत्रिका शर्व-हृदि-कंज-मकरंद-मधुकररुचिर-रूप,भूपालमणि नौमि रामं ॥ सर्वसुन-धाम-गुणग्राम, विश्रामपद नाम सर्वसपदमति पुनीतं । निर्मलं शांत, सुविशुद्ध, बोधायतन, क्रोध-मद-हरण, करुणा- निकेतं ॥२॥ अजित, निरुपाधि, गोतीतमव्यक्त, विभुमेकमनवद्यमजमद्वितीयं । प्राकृतं प्रकट परमातमा, परमहित, प्रेरकानंत वंदे तुरीयं ॥३॥ भूधरं सुन्दरं, श्रीवरं, मदन-मद-मथन सौन्दर्य-सीमातिरम्यं । दुष्पाप्य, दुष्प्रेक्ष्या दुस्तय॑ दुष्पार, संसारहर,सुलभ, मृदुभाव. गम्यं ॥ ४॥ सत्यकृत, सत्यरत, सत्यव्रत सर्वदा, पुष्ट, संतुष्ट संकष्टहारी। धर्मवर्मनि ब्रह्मकर्मवोधैक, विप्रपूज्य, ब्रह्मण्यजनप्रिय, मुरारी॥५॥ नित्य, निर्मम, नित्यमुक्त, निर्मान, हरि,शानधन, सच्चिदानंदमूलं। सर्वरक्षक, सर्वभक्षकाध्यक्ष, कूटस्थ, गूढार्चि, भक्तानुकूलं ॥६॥ सिद्ध-साधक-साध्य, वाच्य-चावकरूप, मंत्र जापक-जाप्य, सृष्टि- स्रष्टा। परम कारण, कजनाभ, जलदाभतनु,सगुण, निर्गुण, सकल घश्य- द्रष्टा ॥ ७॥ व्योमच्यापक, विरज, ब्रह्म,वरदेश, वैकुंठ, वामनविमलब्रह्मचारी। सिद्ध-दारकावृंदवंदित सदा, खंडि पाखंड-निर्मूलकारी ॥ ८॥ पूरनानंदसंदोह, अपहरन संमोह-अज्ञान, गुण-सन्निपातं । बचन-मन-कर्म-गत शरण तुलसीदास पास-पाथोधिइव कुंभजातं। भावार्थ-समस्त सौभाग्यके देनेवाले, सब प्रकारसे कल्याणके भण्डार, विश्वरूप, विश्वके ईश्वर, सबको सुख देनेवाले, शिवजीके हृदय-कमलके मकरन्दको पान करनेके लिये भ्रमररूप, मनोहर