पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/९९

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- विनय-पत्रिका रूपवान् एवं राजाओंमें शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीको मै प्रणाम करता हूँ॥१॥ हे श्रीरामजी! आप सब सुखोंके धाम, गुणोंकी राशि और परमशान्ति देनेवाले हैं । आपका नाम समस्त पदार्थोंको देनेवाला तथा बडा ही पवित्र है । आप शुद्ध, शान्त, अत्यन्त निर्मल, ज्ञानखरूप, क्रोध और मदका नाश करनेवाले तया करुणाके स्थान हैं ॥२॥ आप सबसे अजेय, उपाधिरहित, मन-इन्द्रियोंसे परे, अव्यक्त, व्यापक, एक, निर्विकार, अजन्मा और अद्वितीय हैं। परमात्मा होनेपर भी प्रकृतिको साथ लेकर प्रकट होनेवाले, परम हितकारी, सबके प्रेरक, अनन्त और निर्गुणरूप हैं। ऐसे श्रीरामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ३ ॥ आप पृथ्वीको धारण करनेवाले, सुन्दर, लक्ष्मीपति, सुन्दरतामें कामदेवका गर्व खर्व करने- वाले, सौन्दर्यकी सीमा और अत्यन्त ही मनोहर हैं । आपको प्राप्त करना बड़ा कठिन है, आपके दर्शन बड़े कठिन हैं, तर्कसे कोई आपको नहीं जान सकता, आपकी लीलाका पार पाना बड़ा कठिन है। आप अपनी कृपासे आवागमनरूप संसारके हरनेवाले भक्तोंको सहजहीमें दर्शन देनेवाले और प्रेम तथा दीनतासे प्राप्त होनेवाले हैं ॥ ४ ॥ आप सत्यको उत्पन्न करनेवाले, सत्यमें रहनेवाले सत्य-संकल्प, सदा ही पुष्ट-~-दिव्य शक्ति- सामर्थ्यवान्, सन्तुष्ट और महान् कष्टोंके हरनेवाले हैं । धर्म आपका कवच है, आप ब्रह्म और कर्मक ज्ञानमे अद्वितीय हैं, ब्राह्मणोंके पूज्य हैं, ब्राह्मणों और भक्तोंके प्यारे हैं तथा मुर दानवके मारनेवाले हैं ॥५॥ हे हरे ! आप नित्य, ममतारहित, नित्यमुक्त, मानहित, पापोंके हरने- वाले, ज्ञानस्वरूप, सच्चिदानन्दधन और सबके मूल कारण हैं। आप