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वैदेही-वनवास

हरी भरी तरु - राजि कान्त - कुसुमालि से।
विलसित रह फल - पुंज - भार से हो नमित ।।
शोभित हो मन - नयन - विमोहन दलो से ।
दर्शक जन को मुदित वनाती थी अमित ॥३॥

रंग विरंगी अनुपम - कोमलतामयी।
कुसुमावलि थी लसी पूत - सौरभ वसी ।।
किसी लोक - सुन्दर की सुन्दरता दिखा।
जी की कली खिलाती थी उसकी हँसी ॥४॥

कर उसका रसपान मधुप थे घूमते ।
गूंज गूंज कानों को शुचि गाना सुना ।।
आ आ कर तितलियाँ उन्हें थी चूमती ।
अनुरंजन का चाव दिखा कर चौगुना ।।५।।

कमल - कोप में कभी बद्ध होते न थे।
अंधे बनते थे न पुष्प - रज से भ्रमर ।।
कॉटे थे छेदते न उनके गात को।
नही तितिलियो के पर देते थे कतर ।।६।।

लता लहलही लाल लाल दल से लसी ।
भरती थी हग मे अनुराग - ललामता ।।
श्यामल - दल की बेलि बनाती मुग्ध थी।
दिखा किमी धन-नचि-तन की शुचि झ्यामता ॥७॥