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शिवशम्भु के चिट्ठे


साल बढ़कर चालीस हो गयी, उस समय भी श्रीमान् की समझमें आ गया था कि वहांकी सुन्दर आबहवा के प्रताप से आप चालीस सालके होने पर भी बत्तीस-तैंतीसके दिखाई देते हैं। पर इस देशकी आबहवा की तासीर आपके कुछ समझ में न आई। वह विलायतमें भी श्रीमान् के साथ लगी गई और जब तक वहां रहे, अपना जोर दिखाती रही। यहां तक कि फिर आपको एक बार इस देशमें उठा लाई, किसी विध्न-बाधा की परवा न की।

माइ लार्ड! इसका नमक यहांके जलवायुका साथ देता है; क्योंकि उसी जलवायु से उसका जन्म है। उसकी तासीर भी साथ-साथ होती रही। वह पहले विचार-बुद्धि खोता है। पीछे दया और सहृदयाताको भगाता है और उदारताको हजम कर जाता है। अन्तको आंखों पर पट्टी बांधकर, कानोंमें ठीठे ठोककर, नाकमें नकेल डालकर आदमीको जिधर-तिधर घसीटे फिरता है और उसके मुंहसे खुल्लमखुल्ला इस देशकी निन्दा कराता है। आदमीके मनमें वह यही जमा देता है कि जहांका खाना, वहाँ की खूब निन्दा करना और अपनी शेखी मारते जाना। हम लोग भी उस नमककी तासीरसे बेअसर नहीं हैं। पर हमारी हड्डियां उसीसे बनी हैं, इस कारण हमें इतना ज्ञान रहता है कि हमारे देशके नामककी क्या तासीर है। हम लोग खूब जानते थे कि यदि श्रीमान् कहीं दूसरी बार भारतमें आ गये, तो एकदम नमककी खानमें जाकर नमक हो जावेंगे। इसीसे चाहते थे कि दोबारा आप न आवें। पर हमारी पेश न गई। आप आये और आते ही उस नमककी तासीरका फल अपने कौंसिल और कानवोकेशनमें प्रकट कर डाला!

इतने दिन आप सरकारी भेदोंके जाननेसे, अच्छे पद पानेसे, उन्नतिकी बातें सोचनेसे, सुगमताके शिक्षा लाभ करनेसे, अपने स्वत्वोंके लिये पार्लामेण्ट आदिमें पुकारनेसे इस देशके लोगोंको रोकते रहे। आपकी शक्तिमें जो-कुछ था, वह करते रहे। पर उसपर भी सन्तोष न हुआ, भगवान की शक्तिपर भी हाथ चलाने लगे! जो सत्यप्रियता इस देशको सृष्टिके आदिसे मिली है, जिस देशका ईश्वर "सत्यंज्ञान-मनन्तंब्रह्म" है, वहांके लोगोंको सभामें बुलाके ज्ञानी और विद्वानका चोला पहनकर उनके मुंहपर झूठा और