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सप्तसरोज
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का परवाना आ पहुँचा। कार्यपरायणता का दण्ड मिला। बेचारे भग्न हृदय, शोक और खेदसे व्यथित घरको चले। बूढे मुंशीजी तो पहले ही कुड़बुडा रहे थे कि चलते चलते इस लड़के को समझाया था, लेकिन इसने एक न सुनी। बस मनमानी करता है। हम तो कलार और कसाई के तगादे सहे, बुढ़ापेमें भगत बनकर बैठे और वहा बस वही सूखी तनख्वाह। हमने भी तो नौकरी की है और कोई ओहदेदार नहीं थे, लेकिन जो काम किया, दिल खोलकर किया और आप ईमानदार बनने चले हैं। घरमे चाहे अन्धेरा, मस्जिदमे अवश्य दीया जलायेंगे। खेद ऐसी समझपर। पढ़ना लिखना सब अकारथ गया। इसके थोडे ही दिनों बाद, जब मुंशी वंशीधर इस दुरवस्थामें घर पहुँँच और बुढे़ पिताजीने यह समाचार सुना तो सिर पीट लिया। बोले, जी चाहता है कि तुम्हारा और अपना सिर फोड़ लू। बहुत देर तक पछता पछताकर हाथ मलते रहे। क्रोध में कुछ कठोर बात कहीं और यदि वंशीधर वहांसे टल न जाते तो अवश्य ही यह क्रोध विकटरूप धारण करता। वृद्धा माताको भी दुख-हुआ जगन्नाथ और रामेश्वर यात्राकी कामनाए मिट्टीमे मिल गई। पत्नीने तो कई दिनतक सीधे मुह से बात नहीं की।

इसी प्रकार एक सप्ताह बीत गया। सन्ध्या का समय था। बुढे मुशीजी बैठे राम-नाम की माला फेर रहे थे। उनके द्वारपर एक सजा हुआ रथ आकर रुका।हरे और गुलाबी परदे, पछहियेंं बैलोकी जोड़ी, उनके गर्दनोमें नील धागे सींग पीतलसे जड़ी हुई। कई नौकर लाठियां कंधोपर रखे साथ थे।