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पृष्ठ:समाजवाद और राष्ट्रीय क्रान्ति.pdf/१३१

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दूर होगी उतना ही नेनी में हम अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकेंगे। मेरे लिए इस विषय पर विस्तार से बोलने की आवश्यकता न होती यदि धारासभा में पार्लियामेन्टमय बोर्ड स्वराज्यपार्टी के पुराने पद-चिन्हों पर नली होती और यदि कुछ जिम्मेदार व्यक्तियों ने इन मुधारों को कार्यान्वित करने के लिए भूमधर्म प्रचार प्रारम्भ न कर दिया होता। जब सन् १६३४ में कराँची में स्वराजपार्टी का पुनर्जन्म हुआ था तब उसने जो नीति और कार्यक्रम अपने सामने रखा था उसमें पदग्रहण के विषय में चुप्पी का आश्रय लिया गया था और सम्पूर्ण कार्यक्रम में सुधारों को कार्यान्वित करने की भावना ही थी। इससे स्पष्टतया उस भारी परिवर्तन का पता लगता है जो सविनय अवज्ञा अान्दोलन के पश्चात् हमारे परिषदियों की मनोवृत्ति में हो गया था । सम्भवतः अान्दोलन में हुई देश की हार और सविनय विरोध के वातावरण के अभाव के कारण उन्होंने अपनी पुरानी वाधा डालने की नीति में परिवर्तन करना उचित समझा । पार्लियामेंन्टीय बोर्ड की सामान्य मनोवृति, उसके प्रतिनिधियों का असेम्बली में अपने निर्वाचन के समय किथे गये वायदों को पूरा न कर सकना, गवर्नमेंन्ट के ऊपर सरल और थोथी विजय प्राप्त करने की उनकी उत्कट अभिलापा और इस कार्य के लिए अपने सिद्धान्तों का बलिदान करके भी अन्य पार्टियों का सहयोग प्राप्त करने का उनका प्रयास इन सब बातों से हमें यह श्राशा नहीं होती कि इन सुधारों को अस्वीकृत कराने के लिए कोई दृढ़ प्रयत्न किया जायगा । दूसरी ओर मुधारों को कार्यान्वित करने के लिए अनुकूल वातावरण चुपचाप बनाया जा रहा है और राष्ट्र के मष्तिस्क को शनैः