सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:समाजवाद और राष्ट्रीय क्रान्ति.pdf/२६२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

(२३५ ) प्रभाव डाल रहा हैं और छोटे बुर्जुश्रा वास्तव में छोटापन (श्रोलापन ) दिखा रहे हैं। क्रांतिकारी उत्साह इस समय ठण्डा पड़ गया है और धारासभाओं में स्थान पाने के लिए कार्यकर्ताओं की धक्कामुक्की का भद्दा और घृणास्पद दृश्य सब ओर दिखाई देता है। लेनिन ने रूस के बारे में कहा था कि वहां लोग तो बहुत से है, परन्तु मनुष्य नहीं हैं । यह हमारे विषय में भी ठीक है । हमने अयने कार्यकर्तालों के शिक्षण पर शायद ही कभी ध्यान दिया है । हमने अपने कार्यकर्ताओं के विचारों और बुद्धि को गति देने और उन्हें अपने देश की समस्याओं से अवगत कराने के लिए नहीं करते । कार्यकर्ताओं की कार्यपटुता बढ़ाई जानी च हिये और विशिष्ट कार्य करने की उनकी व्यवहारिक योग्यता विकसित की जानी चाहिये। फिर स्थानीय कमेटियों को तो केवल ऊपर की प्राज्ञायों को क्रियान्वित करना है । सम्पूर्ण सोच विचार ऊपर ही हो जाता है और मूलभूत मसलों पर भी उनकी राय नहीं ली जाती । इस प्रकार उनमें स्वतन्त्र रूप से कार्य करने की क्षमता बिलकुल नहीं है और उन्हें अपने विचार स्वयं सोचने और रखने के लिए कभी प्रोत्साहन नहीं दिया जाता। हमारा कार्य अब भी हलचल मचाने के ढङ्ग का है, यद्यपि उसका समय बहुत पहिले बीत चुका है । यह सब बदला जाना चाहिये । हमें ग्रामों के लिए एक नव जीवन आन्दोलन चलाना चाहिये जिसका उद्देश्य लोगों के सांस्कृतिक पिछड़ेपन को दूर करने का होना चाहिये जिससे उन्हें ये ध्येय प्राप्त हों, और उनने सहकारी और जनतन्त्रीय आदतों का विकास हो।