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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 11.pdf/५७३

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परिशिष्ट ५३५ कर सकते हैं। मैं कह चुका हूँ कि नेटाल उपनिवेशके लोगोंने ऐसी व्यवस्था कर ली है; मेरे खयालसे उससे उन्हें पूर्ण सन्तोष है और स्मरण रखिए कि उनका स्वार्थं सम्भवतः आपसे बड़ा है क्योंकि उनका प्रदेश प्रवासके लिए अधिक समीप पड़ता है । यह प्रवास वहाँ बहुत बड़े पैमानेपर आरम्भ भी हो चुका है और वहाँके लोगोंने एक कानून बना लिया है जिससे उनका खयाल है वह सब मिल जात है जो उन्हें अभीष्ट है एवं जिसपर मेरी की गई आपत्ति भी लागू नहीं होती । साथ ही वह कानून इस भावना के विरुद्ध भी नहीं है जिसमें मेरा विश्वास है, आप भी मेरे साथ हैं । इसलिए मुझे आशा है कि आपके यहाँके प्रवास कालमें हमारे लिए कानूनकी एक ऐसी शब्दावली तैयार कर लेना सम्भव हो सकता है जिससे महामहिमामयी साम्राज्ञीकी भावनाओं को चोट न पहुँचे और साथ ही आस्ट्रेलियाई उपनिवेशोंकी उस वर्गकी आक्रमणले रक्षा भी हो जाये जिसके विरुद्ध उनका आपत्ति करना उचित है । " इसके बाद ब्रिटिश साम्राज्यमें भारतकी स्थितिपर १९०७ के उपनिवेशीय सम्मेलनमें श्री ऐस्क्विथने भी जोर दिया था । उन्होंने कहा था : “जिन जहाजोंपर हमारे भारतीय सह-प्रजाजनोंको नौकरी नहीं दी जाती उनमें माल ढुलाईके सम्बन्धमें हम किसी भी हालत में ऐसी कोई रियायत स्वीकार करना नहीं चाहते जो केवल हमें ही दी जा सकती हो। हम किसी प्रकार इससे सहमत नहीं हो सकते और यहाँ मौजूद प्रत्येक व्यक्ति कहेगा कि हम इस तरहको शर्तसे मर्यादित रियायत न लेना अधिक पसन्द करेंगे । खास कठिनाइयाँ सन् १८९७ के बादके घटनाक्रमका संक्षेपमें उल्लेख करना अनावश्यक है; किन्तु स्वशासित उपनिवेशों में एशियाई प्रश्न जिन रूपोंमें उठे हैं, वे संक्षेप में बताये जा सकते हैं । नेटाल भारतीय मजदूर केवल नेटालमें आते हैं; वहाँ कुलियोंकी बहुत बड़ी संख्या आ जानेसे भारतीय निवासियोंकी आबादी बढ़ गई है । ये कुली अपनी गिरमिट पूरी होनेके बाद एक विशिष्ट कर देना स्वीकार करके उपनिवेशमें ही रह जाते हैं । यह आबादी कुछ हद तक उन लोगोंके " स्वतन्त्र ” प्रवाससे भी बड़ी है जो प्रवासी अधिनियम के अन्तर्गत लागू की गई शिक्षा-परीक्षा पास करके आ सके हैं। व्यापारिक परवानों, नगरपालिका मताधिकार और भारतीय बच्चों की शिक्षा के सम्बन्ध में कठिनाइयाँ पैदा हुईं, और १९०८ में संसद द्वारा दो विधेयकोंके पास किये जानेसे वे और भी उग्र हो गई । इनमें एक विधेयक एशियाइयोंको नये व्यापारिक परवाने देना बन्द करनेके सम्बन्धमें था और दूसरा एक निश्चित समयके बाद एशियाइयों द्वारा व्यापारिक परवानोंका रखा जाना निषिद्ध करनेके सम्बन्धमें । ये विधेयक भविष्यके लिए सुरक्षित कर दिये गये और उसके बाद अमल नहीं लाये गये । किन्तु सन् १९०९ में १८९७ के व्यापारिक परवाना कानूनमें इस आशयका संशोधन कर दिया गया कि वर्तमान परवानोंको नया करनेके सम्बन्धमें सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है, यद्यपि परवानोंका हस्तान्तरण करने या नये परवाने देनेके सम्बन्धमें अपील नहीं की जा सकती । ट्रान्सवाल ट्रान्सवालमें, जहाँ से युद्धकालमें अधिकांश भारतीय चले गये थे, स्वायत्तीकरण (एनेक्सेशन) के बाद बड़ी संख्या में भारतीयोंके आनेसे और दक्षिण आफ्रिकी गणतन्त्रके कुछ कानूनों और विनियमोंके निश्चित प्रभावके सम्बन्धमें सन्देह होनेसे भारी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो गई। शान्ति-रक्षा अध्यादेशके अन्तर्गत उन्हीं एशियाई लोगोंको उपनिवेशमें प्रवेशके अनुमतिपत्र दिये गये थे जो वहाँ युद्धसे पूर्वं रहते थे । यह विधान १९०७ के एशियाई कानून संशोधन अधिनियमसे, जो उत्तरदायी शासन दिये जानेके तुरन्त बाद पास किया गया था, स्थायी बना दिया गया और यद्यपि उसी वर्षंका प्रवासी प्रतिबन्धक अधिनियम नेटालके अधिनियमके नमूनेका बनाया गया था, किन्तु इन दोनों अधिनियमोंका संयुक्त प्रभाव यह होता था कि Gandhi Heritage Portal