करता है वह इसमें पड़े बिना रह ही नहीं सकता। इसमें से राजनैतिक, आर्थिक आदि विषयों के परिणाम तो सुन्दर आयेंगे ही, लेकिन सबसे सुन्दर परिणाम तो यह होगा कि इस प्रवृत्ति से बहुत सारे लोगों का उद्धार हो जायेगा, बहुत सारे मोक्ष के योग्य बन जायेंगे। अगर साल के अन्त में हमें ऐसा अनुभव न हो तो मेरे लिए जीना दूभर हो जायेगा।
वे बहुत बार कहा करते थे कि अगर कोई मुझे चारों ओर से बरछी भोंके तो मैं उसे सह सकता हूँ, लेकिन जगत में जो झूठ, पाखंड और अत्याचार चल रहा है, धर्म के नाम पर जो अधर्म किया जा रहा है उसकी बरछी सहन नहीं होती। अत्याचारों पर उन्हें रोष आता था और मैंने उन्हें अनेक बार क्रोधित होते हुए देखा है। उनके लिए सारा जगत् उनका सगा था। अपने भाई अथवा बहन को मरते देख हमें जो क्लेश होता है उतना ही क्लेश उन्हें जगत में दुःख और मृत्यु को देखकर होता था। अगर कोई कहता कि लोग अपने पाप के कारण दुःख पा रहे हैं, तो वे कहते : लेकिन उन्हें पाप करना क्यों पड़ा ? जब पुण्य को सरल मार्ग नहीं मिलता और बड़ी-बड़ी खाइयों और पर्वतों को लाँघना पड़ता है तब उसे हम कलिकाल कहते हैं। उस समय जगत में पुण्य बहुत नहीं दिखाई देता, स्थान-स्थान पर पाप ही दिखाई देता है। पुण्य के नाम पर पाप चल पड़ता है। वैसी स्थिति में अगर हम दयाधर्म का पालन करना चाहें तो हमारी आत्मा क्लेश से विकल होनी ही चाहिए। हमें ऐसा लगेगा कि ऐसी स्थिति में जीवित रहने की अपेक्षा तो देह जर्जरित हो जाये अथवा उसका अवसान हो जाये, यही ज्यादा अच्छा है।
रायचंदभाई का इतनी कम उम्र में देहावसान हो गया, इसका कारण भी मुझे यही लगता है। यह सच है कि वे बीमार थे, लेकिन जगत के ताप का जो कष्ट उन्हें था वह उनके लिए असह्य था। अगर उन्हें केवल शारीरिक कष्ट ही होता तो वे जरूर उस पर विजय पा लेते। लेकिन उन्हें लगा कि ऐसे विषम काल में आत्मदर्शन कैसे हो सकता है ? यह उनके दयाधर्म का सूचक है।
दयाधर्म की परिसीमा खटमल को न मारने में नहीं है। यह सच है कि खटमल को नहीं मारना चाहिए, लेकिन खटमलों की उत्पत्ति को भी रोकना चाहिए। खटमलों को मारने में जितनी क्रूरता है उससे कहीं अधिक क्रूरता उनको उत्पन्न होने देने में है।
हम सब खटमलों को पैदा करते हैं, श्रावक भी ऐसा ही करते हैं और मैं वैष्णव भी ऐसा करता हूँ। हम शौचादि के नियमों से परिचित ही नहीं हैं। परिग्रह को बढ़ाते समय हम कोई विचार नहीं करते और अनावश्यक वस्तुओं के परिग्रह से खटमल नहीं होंगे तो और क्या होगा ?
खटमल, मच्छर आदि क्षुद्र जन्तुओं को न मारने में दयाधर्म है। लेकिन इससे बढ़कर दयाधर्म तो यह है कि हम मनुष्य की हत्या न करें। मनुष्य को मारें अथवा खटमल को - यह प्रश्न उपस्थित होने पर हम क्या करेंगे ? मनुष्य को मारकर मच्छर को उबारने का प्रसंग आना भी सम्भव है। मैं तो इन दोनों तरह के प्रसंगों से छुटकारा पाने का मार्ग बताता हूँ और वह है दयाधर्म।
कविश्री का कहना था कि "जैन-धर्म अगर श्रावकों के हाथ में न गया होता तो इसके तत्त्वों को देखकर जगत चकित हो उठता। बनिये तो जैन-धर्म के तत्त्वों को बदनाम