पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/१०५

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पवित्रता भला इनकी माताओं को इनकी बहनों को इनकी कन्याओंको क्यों नग्न कर रहे हो? द्रौपदी की साढ़ियां उतार २ अपनी पवित्रता के साधन कर रहे हो ? फूक क्यों नहीं डालते उन ग्रन्थों या हिस्सों को जहां तुमको ऐसा बहशी बनाकर पवित्र बनाने के झूठे वचन लिखे हैं । किससे छिपाते हो ज्यो र द्रौपदी को नग्न करने में लगे हो त्यों २ तुम्हारा वैराग्य और त्याग गंगा में बह रहा है । गेरुवे कपड़े के नीचे वैसे के वैसे न सजे पत्थर की तरह तुम निकले । ऐसा तिरस्कार करना और अपवित्र होना यह तो मन की चंचलता और ध्यान के अद्भुत नियमों को हड़ताल लगाना है । कदाचित् असम्भब सम्भव हो जाय परन्तु ऐसे वैराग्य और त्याग से जिस्में जिसमें अपनी माताओं बहिनों कन्याओं के नग्न शरीरों को नीलाम करके पवित्रता खरीदनी है तब कदाचित् पवित्रता, न मन में, न दिल में, न आत्मा में, न देश में कभी आयगी ! मेरा विचार है कि कारण चाहै कुछ हो हमारे देश में इस झूठे त्याग और वैराग्य के उपदेश ने पवित्रता अकपटता सचाई का नाश कर दिया है, जिस उपदेश में मेरी माता का मेरी बहिन का, मेरी स्त्रीका, मेरी कन्या का तिरस्कार हो और तैसे ही तुम्हारी का भला वह कब मेरे तेरे हम सब के लिये देश भर के लिये कभी कल्याणकारी हो सक्ता सकता है ? सूर्य चाहे अंध होकर काला हो जाय, परन्तु जहाँ ऐसा तिरस्कार स्त्री जाति का होता है वहाँ अपवित्रता, दरिद्रता दुःख कंगाली झूठ कपट राज्य न करें, चाण्डाल गद्दी पर न बैठे यह कदापि नहीं हो सत्ता [ सकता] । ए बुद्ध भगवन् ! क्यों न आपने अपने बाद आने वाले बुद्ध के नाम को ले लेकर संसार को अपवित्र वनाने वालो का विचार किया ? क्यों न आपने डंके की चोट से इस अनर्थनिवारणार्थ अपने बाद इस पुरुष की माता, पुत्री, बहिन को, स्त्री को, इस नीचे पुरुष के लिए अपने सामने उच्च सिंहासनपर बिठा इसको अाज्ञा दी कि वचपन से लेकर जब > १०५.