पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/११३

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

पवित्रता कृपा कटाक्ष से आपको कुछ बुद्धि उत्पन्न हो गई थी। मैंने तो पक्षी और पशुओं को भी जप तप संयमका साधन करते देखा । यह महाग्रन्थ काठके पुतलों के लिये कदापि नहीं लिखा गया जिनके हाथ में माला आई और सहस्रों वर्ष व्यतीत हुए । माला के मनके ही फिर रहे हैं । जप के साधनों का भी अन्त नहीं हुआ, कुटिलता, नीचता, कपटता अन्दर भरी हुई है और माला मनकों के ऊपर से हज़ारोवार चली जाती है और इतनी सदियाँ हुइँ [हुई] अब तक चली ही जा रही है । जब तक हम मनुष्य नही बन जाते तब तक न कोई गुरु, न कोई वेद, कोई शास्त्र, न कोई उपदेश तुह्मा[म्हारे लिए कल्याण का साधन हो सक्ता सकता है। , इसका सबूत मांगो तो इस बाहर से माने हुए भारत निवा- सियों के मकान, गली, कंचे, घर का जीवन और सदियों का लम्बा जीवन देख लो। किसी ने इन काठके पुतलों को जो कहा कि तुम ऋषिसन्तान हो, बस ! अब हम ऋषिसन्तान हैं । इसकी माला फिरनी शुरू हुई ! इधर तौ योग प्राप्त न हुआ, कैवल्य का कुछ मुख न देखा, इधर अब माला शुरू हुई है, देखिये ये कब ऋषिरूप होते हैं । हमारी अवस्था भयानक है। मेरे विचार में प्राचीन ऋषियों के साथ आज कल के भारतनिवासी उनको शूद्रों की श्रेणी से भी कम पदवी के हैं, वे ऋषि अब होते तो सच कहता हूं हमको म्लेच्छ कहकर हमसे धर्म- युद्ध रचते और हमें इस देश से निकाल इस धरती को फिर से आर्य भूमि बनाते । उन्होंने असुरों से युद्ध मचाया ही था और असुरो को परास्त किया ही था। जब असुरों को सहार न सके तो हम मैले कुचैले लोगों को अपने पास कब फटकने देते । क्या असुर, जन्म से उनके पुत्र पौत्र नहीं थे ? तप नहीं, दान नहीं, ज्ञान ही सही। हाय ! वह वस्तु जिसको n