पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/११४

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पवित्रता पाकर शाक्यमुनि बुद्ध हो गये । जिसको पाकर मीराबाई हमारे हृदय और बुद्धि को हिला देनेवाले बल में बदल गई । ज्ञान जिसको पाकर एक तरखान का बच्चा श्राधे जगत् का अधिपति हो गया। जिसको पाकर जुलाहे चमार चण्डाल, ब्राह्मणों से भी उत्तम पदवी को प्राप्त हो गए। जिसके चमत्कार से बालक ध्रुव अटल पदवी को पाकर न हिलनेवाला तारा हो गया । वह ज्ञान जिसकी महिमा गाते २ महाप्रभु चैतन्य अपनी सारी विद्या को भूल गये। जिसके महत्त्व से एक ऊँट लादनेवाला चाकर ऐसा बलवान हुआ कि कुल पृथ्वी उस ज्योतिष्मान् पुरुष के बल से उभड़ उठी। उसके आ जाने से तो और भला क्या वाकी रहा परन्तु नहीं, भारतनिवासियों ने एक प्रकार की पुड़िया और गोली बनाई है जिसको खाते ही चन्द्रमा चढ़ जाता है, ज्ञान हो जाता है । वह हो पास तौ फिर कुछ और दरकार नहीं होता। ो जगत्वालो ? बड़ी भारी ईजाद हुई है छोड़ दो अपनी पदार्थविद्या, जाने दो यह रेल, यह जहाज़, ये नये २ उड़नखटोले, हवा में तैरनेवाले लोहे के जंजीरे, प्रकृति की क्यों छान वीन कर रहे हो ? इससे क्या लाभ ? हृपीकेशमें वह अनमूल्य गोली बिकती हैं, और सिर्फ दो चपाती के दाम, जिस गोली के खाने से सारे जन्म कट जाते हैं, सब पाश टूट जाते हैं, और जीवनमुक्त हो सारे संसार को अपनी उङ्गलियों पर नचा सकोगे, विना नेत्र के, बिना बुद्धि के, बिना विद्या के, बिना हृदय के, बुद्धवाली निवाण, पतञ्जलि बाली कैवल्य, वैशेषिक वाली विशेष, वेदान्तवाली विदेहमुक्ति मिलती है, बेचनेवाले देखा वो जा रहे हैं, तीन चार पुस्तके हाथ में हैं और तीन चार पुस्तके बगल में, आपको इन दो पुस्तकों के पढ़ने से ही ब्रह्मकी प्राप्ति हो गई है, ज्ञान हो गया है, एक वेचारा पंजाबी साधु गाता था- "अगे आप खुदा कहा ऊँ देसा, हुण बन बैठे खुदा दे प्यो यारो' ,