पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/१५७

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करने की अनुभूति । सोहने-मोहक । कदूरत-गंदापन । इखलाकी- शील या नीति-सम्बन्धी । मुल्की-राज्य सम्बन्धी । नियामिका- नियंत्रण करनेवाली । विधायिका-रचना करनेवाली । गुमराह- रास्ता भूलना । समष्टिगत-सामूहिक सत्ता । रस्मोरवाज-रीति, परिपाटी । पतिवरा-पति को वरण करनेवाली कन्या । ढब-युक्ति । दीनों दुनियाँ-यह लोक और परलोक । मुबारक-मंगलप्रद । बिछुड़ती दुलहन वतन से है - अपने पिता के घर से पति के घर जाने के लिए जब दुलहन विदा होने लगती है तो उस समय का वातावरण करुणा और प्रेम से भर जाता है। शरीर में रोमाञ्च हो पाता है और गला रुक जाता है । उसे पुनः उस घर लौटने की कोई युक्ति नहीं है अतः शरीर रोमाञ्चित है और गला रुंध गया है । जात्रो तुम्हें यह लोक और परलोक दोनों मंगल देने वाले हों और हम लोगों के लिए हमारा दूल्हा सदा ही कुशल पूर्वक कायम रहे; पर हाँ प्रेम का यह आखिरी दृश्य भूलना नहीं, सदा याद रखना कि प्रेम में शरीर रोमाञ्चित है और गला रुंधा हुआ है । मखौल-हँसी-ठट्ठा । पवित्रता बियावान-उजाड़, निर्जन और निर्जल स्थान । कंचनगंगा- हिमालय एक रमणीय शिखर । चंडूल-एक पक्षी । कजा-सम्पन्न, ( मृत्यु, नागा)। था जिनकी खातिर नाच किया०-जिनको प्रसन्न करने के लिए यह नाच किया था, जब उनकी मूर्ति सामने आ गयी तब उस आनन्द की विह्वलता में मैं आप कहीं रह गया, नृत्य दूसरी जगह हो गया और तान कहीं की कहीं लहराने लगी । ईद-शुभ दिन । मार्गशीर्ष अगहन का महीना । मोतिया- बिन्द आँख में सफेद दाग पड़ जाना जिससे दिखायी नहीं पड़ता। बुतखाना-मन्दिर । पद्मासन योग करने का आसन विशेष । कपोल -मुखमंडल । सर्वकलासंयुक्त-सभी कलाओं को जाननेवाले । बपतिस्मा-दीक्षा । निर्जन्तुक-जीवों से शून्य । अजनवी-परदेशी । पर्वत का