पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/१५८

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ब्रह्मवादिनी-ब्रह्म का निरूपण करनेवालो। बेयार-बिना दोस्त । दुलदुले-एक घोड़ी जिसे मिश्र के हाकिम ने मुहम्मद साहब को दिया था और जिसकी नकल मुसलमान मुहर्रम के दिनों में निकालते हैं। दीदार-दर्शन । बुतपरस्ती-मूर्ति-पूजा । बागियाना-विरुद्ध । गाहे- बगाहे--कभी कभी। बहशियों--जंगली जानवर, पागल । सदा- शब्द, ध्वनि, पुकारने को आवाज । दुनिया की छत पर०-दुनिया की छत पर खड़ा हूँ और तमाशा देखता हुआ खुश हूँ, कभी कभी मस्ती में पागलों की-सी आवाज लगा देता हूँ । पुलपिट-गिर्जाघर में उपदेश देनेवालों का ऊँचा ग्रासन । निवारणार्थ-रोकने के लिए । संन्यासाश्रम-त्याग और साधना का जीवन । शंकर भगवान्- प्राचार्य शङ्कर । गौड़पाद-शंकराचार्य के गुरु के गुरु, जिन्होंने माण्डूक्योपनिषद् पर कारिकायें लिखी हैं । समष्टि-सामूहिक रूप से । तेजोऽसि तेजो मयि धेहि०-हे परमेश्वर ! आप तेज हैं मुझे भी तेजस्वी करें, आप पुंस्त्व हैं मुझे भी पौरख दें। आप बल है मुझे भो बलवान् बनायें, आप दीप्ति ( चमक ) हैं मुझे भी दोतिमान करें, श्राप यज्ञ हैं मुझे भी यज्ञशील बनायें, आप शक्ति हैं मुझे भी शक्तिमान् करें। हबशी-अफ्रीका को जंगली जाति । डट कर खड़ा हूँ खाली जहान में०--इस शून्य सृष्टि में मैं साहस पूर्वक खड़ा हूँ और अपने लक्ष्य को प्राप्ति के लिए मेरे अपने बल और हृदय में अपार भरोसा है । अमली तौर - कार्य रूप में कर दिखाना । निघण्टु-शब्दकोष । काफूर-कपूर। पतञ्जलि-योग सूत्रों के रचयिता प्रसिद्ध महर्पि । शाक्यमुनि-गौतम बुद्ध । सहार-सहना, बरदाश्त करना । कैवल्य- अपने स्वरूप में स्थिति, मोक्ष, अलिप्तभाव । वैशेपिकवाली-वैशेषिक दर्शन की । विशेष--सात पदार्थों में से एक । निर्वाण-परम शान्ति । विदेह मुक्ति-मृत्यु के बाद मिलनेवाली मुक्ति । अगे आप खुदा०- सृष्टि में मनुष्य को ईश्वर ही कहा जाता है, बाद में तो वह अपना प्रेम अनन्त आत्मा के प्रति अर्पित करके स्वयं ही मनुष्य से ईश्वर बन 2 १५८