पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/३८

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भूमिका उदीयमान निबन्धकार अंग्रेजी निबन्धों से अधिक प्रभावित हुए हैं और उनकी शैली पर भी इसका प्रभाव लक्षित होता है । अध्यापक पूर्णसिंह के निबन्ध- जिस प्रकार विचारात्मक निबन्धों का चरमोत्कर्ष प्राचार्य शुक्ल के निबन्धों में मिलता है उसी प्रकार भावात्मक निबन्धों का चरम विकास अध्यापक पूर्णसिंह के निबन्धों में परिलक्षित होता है । इनके जोड़ का भावात्मक निवन्ध-लेखक हिन्दी में शायद ही कोई हो । गुलेरी जी केवल तीन कहानियाँ लिख कर हिन्दी के अमर कहानीकार बन गये तो अध्यापक जी केवल छह निबन्ध लिख कर हिन्दी के भावात्मक निबन्ध- लेखकों में ध्रुवपद प्राप्त कर गये । परिमाण के ऊपर गुण की महत्ता न होने के ज्वलन्त प्रमाण स्वरूप ये दोनों साहित्यकार सर्वदा याद किये जायेंगे। विषय की दृष्टि से पूर्णसिंह जी के निबन्ध 'सामाजिक' कहे जा सकते हैं। किन्तु यहाँ 'सामाजिक' शब्द का प्रयोग इसके वर्तमान अति प्रचलित अर्थ में नहीं है, हमारे कहने का प्राशय है कि इनके निबन्धों में लोकमंगल की भावना कूट-कृट कर भरी है । 'सच्ची वीरता' और 'पवित्रता' जैसे चारित्रिक निवन्ध भी व्यष्टि की अपेक्षा समष्टि- को ही दृष्टिकोण में रखकर लिखे गये हैं, उनमें सरदार साहब का व्यापक दृष्टिकोण आद्योपान्त समाया हुया मिलेगा। ये जाति, धर्म, देश आदि की संकीर्ण भावनाओं से बहुत ऊपर थे, इनका हृदय प्रेम का स्रोत था। मानवता के ये पुजारी थे, बाह्य याडम्बर से ये घृणा करते थे और सन्त कवियों की तरह निर्भीक होकर पाखण्ड पर कटाक्ष करते थे परन्तु इनके व्यङ्गय भी नीरस नहीं, कटुता का उनमें नाम नहीं । होता भी कैसे ? इनका हृदय प्रेम का लहराता हुअा मानसरोवर था । फिर उससे जो भी शब्द-मुक्ता निकलते उनमें सरसता क्यों न होती ? इन्होंने u ३८