पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/५८

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सच्ची वीरता गूढ तत्त्व और सत्य की तलाश में बुद्ध जैसे राजा विरक्त न [?] होकर वीर हो जाते हैं। कभी किसी आदर्श पर और कभी किसी पर वीरता अपना फरहरा लहराती है। परंतु वीरता एक प्रकार का इलहाम ( Inspiration ) है । जब कभी इसका विकास हुआ तभी एक नया कमाल नजर आया; एक नया जलाल पैदा हुअा; एक नई रौनक, एक नया रंग, एक नई बहार, एक नई प्रभुता संसार में छा गई । वीरता हमेशा निराली और नई होती है । नयापन भी वीरता का एक खास रंग है । हिन्दुओं के पुराणों का वह आलङ्कारिक खयाल, जिससे पुराणकारों ने ईश्वरावतारों को अजीब अजीब और भिन्न भिन्न लिबास दिये हैं, सच्ची मालूम होती है; क्योंकि वीरता का एक विकास दूसरे विकास से कभी किसी तरह मिल नहीं सकता । वीरता की कभी नकल नहीं हो सकती; जैसे मन की प्रसन्नता कभी कोई उधार नहीं ले सकता । वीरता देश-काल के अनुसार संसार में जब कभी प्रकट हुई तभी एक नया स्वरूप लेकर आई, जिसके दर्शन करते ही सब लोग चकित हो गये-कुछ बन न पड़ा और वीरता के आगे सिर झुका दिया। जापानी वीरता की मूर्ति पूजते हैं । इस मूर्ति का दर्शन वे चेरी के फूल (Cherry flower) की शांत हँसी में करते हैं। क्या ही सच्ची और कौशलमयी पूजा है ! वीरता सदा जोर से भरा हुआ ही उपदेश नहीं करती । वीरता कभी कभी हृदय की कोमलता का भी दर्शन कराती है। ऐसी कोमलता देखकर सारी प्रकृति कोमल हो जाती है; ऐसी सुंदरता देखकर लोग मोहित हो जाते हैं । जब कोमलता और सुंदरता के रूप में वह दर्शन देती है तब चेरी-फूल से भी ज्यादा नाजुक और मनोहर होती है। जिस शख्स ने यूरप को 'क्रुसेड्ज' (Crusades) के लिये हिला दिया वह उन सबसे बड़ा वीर था जो लड़ाई में लड़े थे। इस पुरुष में वीरता ने आँसुओं और बाहों