पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/८५

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कन्या-दान no चमक रहे हैं । ध्रुव और सप्तर्षि पास ही या खड़े हुए हैं। चन्द्रमा उपस्थित हुआ है । देवी और देवता इस देवलोक में विहार करनेवाली आर्य-पुत्री का विवाह देखने और उसे सौभाग्यशीला होने का आशीर्वाद देने आये हैं। समय पवित्र है। हृदय पवित्र है। वायु पवित्र है और देवी देवताओं की उपस्थिति ने सबको एकाग्र कर दिया है । अब कन्यादान का वक्त है। स्त्रियों ने कन्यादान के माहात्म्य के गीत अलापने शुरू किये हैं। सबके रोम खड़े हो रहे हैं। गले रुक रहे हैं । आँसू चल रहे हैं- "बिछुड़ती दुलहन वतन से है जब खड़े हैं रोम और गला रुके हैं; कि फिर न आने की है कोई ढब खड़े हैं रोम और गला रुके हैं; यह दीनो दुनिया तुम्हें मुबारक हमारा दूल्हा हमें सलामत; याद रखना यह आखिरी छवि खड़े हैं रोम और गला रुके हैं।" ( स्वामी राम) अब प्यारा वीर देव-लोक में रमती देवी के समान अपनी समा- धिस्थ बहन के शरीर को अपने हाथों में उठाये इस देवी के भाग्यवान् पति के साथ प्रज्वलित अग्नि के इर्द-गिर्द फेरे देता है। इस सोहने नौजवान का दिल भी अजीब भावों से भर गया है। शरीर उसका भी उसके मन से गिर रहा है। उसे एक पवित्रात्मा कन्या का दिल, जान, प्राण सबका सब अभी दान मिलता है। समय की अजीब पवित्रता, माता-पिता, भाई, बहन और सखियो के दिलों की अाशायें, सत्वगुणी संकल्पों का समूह, आये हुए देवी-देवताओं के आशीर्वाद, अग्नि और मेहँदी के रंग की लाली, कन्या की निरवलम्बता, अनाथता, त्याग, वैराग्य और दिव्य अवस्था आदि ये सबके सब इस नौजवान के दिल पर ऐसा श्राध्यात्मिक असर करते हैं कि सदा के लिए अपने आपको वह इस देवी के चरणों में अर्पण कर देता है। हमारे 5