पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/९९

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

पवित्रता पास खड़े हैं, इनके चरणों की ओर देख रहे हैं, और श्री सीताजी के मनोरञ्जनदायक वाक्य और आज्ञा को सुन रहे हैं । (१३) जङ्गल बियावान (निर्जन्तुक) है । लम्बे २ पेड़ खड़े हैं । कोई सूखे हैं कोई हरे । श्री सत्यवन्तजी, कुल्हाड़ा कन्धे पर रक्खे आगे २ जा रहे हैं । देवी सावित्री पीछे पीछे जा रही है। एक जगह दोनों बैठ गए हैं । वे इनको देखती हैं, ये उनको देखते हैं। वे उनकी गोद में और ये इनकी गोद में लेट रहे हैं । (१३) नदी पर एक एकान्त स्थान में बहुत सी कन्यायें, स्त्रियाँ, देवियाँ स्नान कर रही हैं। श्री शुकदेव जी पास से गुज़र रहे हैं । उनको कोई भय नहीं हुआ । वे वैसे की वैसे ही खुल्लमखुल्ला नंगी नहा रही हैं । नदी का जल मारे अानन्द के कूद रहा है । ये उछल रहो हैं। (१५) वह राजबालक ध्रुव, ताड़ी (समाधि) बाँधे जंगल में शेरों के मुख में अपने हाथ को दे रहा है, खेल कर रहा है । प्रतीत होता है लड़ रहा है। (१६) छोटे २ बहुत से बच्चे बैठे हैं, पुस्तक हाथ में है और पढ़ रहे हैं, काँय २ हो रही है । (१७) एक नौजवान है फटी हुई बिना बटन की कमीज गले में है । शिर नंगा है । पाँव नंगा है । किसी की तलाश में है, चारों ओर देखता है कभी इस पेड़ के और कभी उस पेड़ के पास जा खड़ा होता है, रोता है । वृक्ष भी उसके साथ रो उठते हैं। प्रेम की मदहोशी में वह गिर पड़ा है आँसू चल रहे हैं। पृथ्वी की रज उसके बालों में विभूति की तरह लग गई है। कभी गिरता है, कभी उठता है । कभी बादल को देख उसे जाते २ खड़ा कर लेता है, शायद किसी को पत्र भेज रहा है । नदी से, पत्थरों से, पक्षियों से, पशुश्रो से बातें करता जा रहा है । अभी यहाँ था, अब नहीं है । ६६