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साहित्य का उद्देश्य

आश्चर्य की बात नहीं । वास्तव में हमारे यहाँ साहित्यिक जीवन का पता ही नहीं। नीचे से ऊपर तक मुरदनी-सी छाई हुई है। यही मुख्य कारण है कि हिन्दी लेखको मे बहुत से ऐसे लोग आ गये है, जिनका स्थान कही और था । और, जब तक शिक्षित समुदाय अपने साहित्यिक कर्तव्य की यो अवहेलना करता रहेगा, यही दशा बनी रहेगी । जहाँ साहित्य सम्मेलन जैसी सार्वजनिक संस्था के सदस्यो की कुल संख्या दो सौ से अधिक नहीं, वहाँ का साहित्य बनने में अभी बहुत दिन लगेगे।


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