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साहित्य का उद्देश्य

हमने मनोविज्ञान का युग कहा है। मानव-बुद्धि की विभिन्नताओं को मानते हुए भी हमारी भावनाएँ सामान्यतः एक रूप होती हैं। अन्तर केवल उनके विकास मे होता है। कुछ लोगों में उनका विकास इतना प्रखर होता है कि वह क्रिया के रूप मे प्रकट होता है वर्ना अविकतर सुषुप्तावस्था में पड़ा रहता है । साहित्य इन भावनाओं को सुषुप्तावस्था से जाग्रतावस्था मे लाने की चेष्टा करता है। पर इस सत्य को वह कभी नहीं भूल सकता कि मनुष्य मे जो मानवता और सौदर्य-भावना छिपी हुई रहती है, वहीं उसका निशाना पडना चाहिए । उपदेश और शिक्षा का द्वार उसके लिए बन्द है । हाँ उसका उद्देश्य अगर सच्चे भावावेश मे डूबे हुए शब्दो से पूरा होता है, तो वह उनका व्यवहार कर सकता है।

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