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साहित्य का उदेश्य


रूप से हमारे मन मे है,उसका वहाँ कहीं पता न था।होली और कजली और बारहमासे की हजारो पुस्तके आये दिन छपा करती है, हम उन्हे साहित्य नहीं कहते । वह बिकती बहुत है, मनोरंजन भी करती है, पर साहित्य नहीं है । साहित्य मे भावो की जो उच्चता, भाषा की जो प्रौढ़ता और स्पष्टता, सुन्दरता की जो साधना होती है, वह हमे वहाँ नही मिलती। हमारा खयाल है कि हमारे चित्रपटो मे भी वह बात नहीं मिलती। उनका उद्देश्य केवल पैसा कमाना है । सुरुचि या सुन्दरता से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं । वह तो जनता को वही चीज़ देंगे जो वह मॉगती है। व्यापार, व्यापार है । वहाँ अपने नफे के सिवा और किसी बात का ध्यान करना ही वर्जित है। व्यापार मे भावुकता आई और व्यापार नष्ट हुआ। वहाँ तो जनता की रुचि पर निगाह रखनी पड़ती है और चाहे संसार का सचालन देवताअो ही के हाथो मे क्यों न हो, मनुष्य पर निम्न मनो- बृत्तियों का राज्य होता है। अगर आप एक साथ दो तमाशों की व्यवस्था करे-एक तो किसी महात्मा का व्याख्यान हो, दूसरा किसी वेश्या का नग्न नृत्य, तो आप देवेगे कि महात्मा जी तो खाली कुरसियों को अपना भाषण सुना रहे हैं और वेश्या के पण्डाल में तिल रखने को जगह नहीं । मुँह पर राम-राम मन मे छुरी वाली कहावत जितनी ही लोकप्रिय है, उतनी ही सत्य भी है । वही भोला भाला ईमानदार ग्वाला जो अभी ठाकुरद्वारे से चरणामृत लेकर आया है, बिना किसी झिझक के दूध मे पानी मिला देता है । वही बाबूजी, जो अभी किसी कवि की एक सूक्ति पर सिर धुन रहे थे, अवसर पाते ही एक विधवा से रिश्वत के दो रूपये बिना किसी झिझक के लेकर जेब मे दाखिल कर लेते हैं। उपन्यासो मे भी ज्यादा प्रचार डाके और हत्या से भरी हुई पुस्तको का होता है । अगर पुस्तको मे कोई ऐसा स्थल है जहाँ लेखक ने संयम की लगाम ढीली कर दी हो तो उस स्थल को लोग बड़े शोक से पढ़ेगे, उस पर लाल निशान बनायेगे, उस पर मित्रों से मुबाहसे करेंगे। सिनेमा मे भी वही तमाशे खूब चलते है, जिनसे निम्न-भावनाओं की