पृष्ठ:साहित्य का उद्देश्य.djvu/१२४

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फिल्म और साहित्य

अन्त मे हमारा यही निवेदन है कि हम भी सिनेमा को इसके परिष्कृत रूप मे देखने के इच्छुक हैं, और आप इस विषय मे जो सराहनीय उद्योग कर रहे हैं, उसको गनीमत समझते है। मगर शराब की तरह यह भी यूरोप का प्रसाद है और हजार कोशिश करने पर भी भारत जैसे सूखे देश मे उसका व्यवहार बढता ही जा रहा है। यहाँ तक कि शायद कुछ दिनो मे वह यूरोप की तरह हमारे भोजन मे शामिल हो जाय । इसका सुधार तभी होगा जब हमारे हाथ मे अधिकार होगा, और सिनेमा जैसी प्रभावशाली, सद्विचार और सद्व्यवहार की मशीन कला-मर्मज्ञों के हाथ मे होगी, धन कमाने के लिए नहीं, जनता को आदमी बनाने के लिए, जैसा योरप मे हो रहा है। तब तक तो यह नाच तमाशे की श्रेणी से ऊपर न उठ सकेगा।

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