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साहित्य का उद्देश्य

अपने विचार प्रकट करने के लिए उसे अरबी का विद्या-सम्बन्धी भडार मिल जाता है, जिससे बढ़कर विद्या की भाषा और कोई नहीं है, और लेखन-शैली मे गम्भीरता और शान आ जाती है, आदि, आदि । इस- लिए क्यो न इन दोनो को अपने-अपने ढग पर चलने दिया जाय और उन्हे अापस मे मिलाकर क्यों दोनो के रास्तों मे रुकावटे पैदा की जाये ? यदि सभी लोग इन तकों से सहमत हो जाये, तो इसका अभिप्राय वही होगा कि हिन्दुस्तान मे कभी राष्ट्रीय भाषा की सृष्टि न हो सकेगी। इसलिए हमे आवश्यक है कि जहाँ तक हो सके, हम इस प्रकार की धारणाओ को दूर करके ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करे जिससे हम दिन पर दिन राष्ट्रीय भाषा के और भी अधिक समीप पहुँचते जायें, और सम्भव है कि दस-बीस वर्षों में हमारा स्वप्न यथार्थता मे परिणत हो जाय। हिन्दुस्तान के हरएक सूबे मे मुसलमानो की थोड़ी-बहुत संख्या मौजूद ही है । सयुक्तप्रान्त के सिवा और-और सूबो मे मुसलमानो ने अपने- अपने सूबे की भाषा अपना ली है । बंगाल का मुसलमान बगला बोलता और लिखता है, गुजरात का गुजराती, मैसूर का कन्नड़ी, मदरास का तामिल और पंजाब का पजाबी आदि । यहाँ तक कि उसने अपने-अपने सूबे की लिपि भी ग्रहण कर ली है । उर्दू लिपि और भाषा से यद्यपि उसका धार्मिक और सास्कृतिक अनुराग हो सकता है, लेकिन नित्यप्रति के जीवन मे उसे उर्दू की बिलकुल आवश्यकता नही पडती । यदि दूसरे- दूसरे सूबो के मुसलमान अपने-अपने सूबे की भाषा निस्सकोच भाव से सीख सकते है और उसे यहाँ तक अपनी भी बना सकते है कि हिन्दुओं और मुसलमानो की भाषा मे नाम को भी कोई भेद नहीं रह जाता, तो फिर संयुक्तप्रान्त पार पजाब के मुसलमान क्यो हिन्दी से इतनी घृणा करते है ?

हमारे सूबे के देहातो मे रहनेवाले मुसलमान प्रायः देहातियो की भाषा ही बोलते हैं । जो बहुत से मुसलमान देहातो से आकर शहर में आबाद हो गये हैं, वे भी अपने घरों मे देहाती जबान ही बोलते है।