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साहित्य का उद्देश्य


फारसी और अरबी के शब्दो से लदी हुई उर्दू भाषा के लिए संयुक्त प्रान्त और पंजाब के नगरों और कस्बो तथा हैदराबाद के बड़े-बडे शहरो के सिवा और कोई क्षेत्र नहीं । मुसलमान संख्या मे अवश्य आठ करोड़ हैं, लेकिन उर्दू बोलनेवाले मुसलमान इसके एक चौथाई से अधिक न होगे । ऐसी अवस्था मे क्या उच्चकोटि की राष्ट्रीयता के विचार से इसकी आवश्यकता नहीं है कि उर्दू मे कुछ आवश्यक सुधार और वृद्धि करके उसे हिन्दी के साथ मिला लिया जाय ? और हिन्दी मे भी इसी प्रकार की वृद्धि करके उसे उर्दू से मिला दिया जाय ? और इस मिश्रित भाषा को इतना दृढ कर दिया जाय कि वह सारे भारतवर्ष मे बोली-समझी जा सके ? और हमारे लेखक जो कुछ लिखे, वह एक विशेष क्षेत्र के लिए न हो बल्कि सारे भारतवर्ष के लिए हो ? सिन्धी भाषा इस प्रकार के मिश्रण का बहुत अच्छा उदाहरण है । सिन्धी भाषा की केवल लिपि अरबी है, परन्तु उसमे हिन्दी के सभी तत्त्व सम्मिलित कर लिये गये है। और शब्दो की दृष्टि से भी उसमे सस्कृत, अरबी और फारसी का कुछ ऐसा सम्मिश्रण हो गया है कि कहीं खटक नही मालूम होती । हिन्दुस्तानी के लिए भी कुछ इसी प्रकार के सम्मिश्रण की आवश्यकता है ।

जो लोग उर्दू और हिन्दी को बिलकुल अलग-अलग रखना चाहते हैं, उनका यह कहना एक बहुत बड़ी सीमा तक ठीक है कि मिश्रित भाषा मे किस्से-कहानियाँ और नाटक आदि तो लिखे जा सकते हैं, परन्तु विज्ञान और साहित्य के उच्च विषय उसमे नहीं लिखे जा सकते । वहाँ तो विवश होकर फारसी और अरबी के शब्दो से भरी हुई उर्दू और सस्कृत के शब्दो से भरी हुई हिन्दी का व्यवहार आवश्यक हो जायगा । विज्ञान और विद्या-सम्बन्धी विषय लिखने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता उप- युक्त पारिभाषिक शब्दों की होती है । और पारिभाषिक शब्दो के लिए हमे विवश होकर अरबी और संस्कृत के असीम शब्द-भण्डारो से सहा- यता लेनी पड़ेगी । इस समय प्रत्येक प्रान्तीय भाषा अपने लिए अलग- अलग पारिभाषिक शब्द तैयार कर रही है । उर्दू मे भी विज्ञान-सम्बन्धी