पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१६७

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काव्य के वर्ण्य-रस-दोष १३१ 'यह अवसर निज कामना किन पूरन करि लेहु । ये दिन फिर ऐहें नहीं यह छनभंगुर देहु ।' -पं० रामदहिन मिश्र के काव्यदर्पण में उद्वत (पृष्ठ ३६३) यहाँ पर यह स्पष्ट नहीं है कि यह उक्ति वैराग्य की है या शृङ्गार की है। ४. अ-स्थान में रस की स्थिति :--अर्थात् प्रसङ्ग-विरुद्ध किसी रस को ले. आना । जहाँ रोना-पीटना मच रहा हो वहाँ शृङ्गार की बात करना इसका उदाहरण होगा। श्रीभिखारीदासजी ने इसके उदाहरण में एक सती होने वाली स्त्री का वर्णन दिया है :- ___ 'सजि सिंगार सर पै चढ़ी, सन्दरि निपट सुबेस । . . : मनों जीति भुविलोक सब, चली जितन दिवदेस ॥' -भिखारीदासकृत काव्यनिर्णय (रसदोष-वर्णन २२) यहाँ पर सुन्दरता के वर्णन में दिवलोक जीतने का जो उल्लेख हुआ है उसमें शृङ्गारिक व्यञ्जना है, यदि नैतिक या प्राध्यात्मिक तेज से जीतने की बात होती तो कोई हानि न थी । ५. रस-विच्छेद :-अर्थात् जहाँ एक रस चल रहा हो वहाँ उसके पूर्ण परिपाक के पहले ही उसके विपरीत किसी दूसरे रस की बात ले आनाः । इसके उदाहरण में साहित्यदर्पणकार ने 'महावीरचरित' का वह स्थल बतलाया है जहाँ पर ': परशुरामजी के साथ वीररसोचित वार्तालाप के समय, रनवास से कङ्कण खुलवाने का बुलावा आने पर, श्रीराम- चन्द्रजी तुरन्त ही बड़ों की आज्ञा का सहारा लेकर भीतर जाने को तैयार हो जाते हैं। वहीं एक साथ प्रसङ्ग समाप्त हो जाता है । इसमें भवभूति के पक्ष में इतना ही कहा जा सकता है कि उस स्थल पर जनकजी और शतानन्दजी के आजाने के कारण वातावरण अपेक्षाकृत शान्त हो गया था। यद्यपि उतना खिंचाव-तनाव नहीं रहा था फिर भी एक दबे हुए मनुष्य की भाँति तुरन्त भीतर चले जाना रामचन्द्रजी की प्रकृति के विरुद्ध-सा अँचता है। .. ... ६. रस की पुनः पुनः दीप्ति :--'अति सर्वत्र वर्जयेत' की बात यहाँ पर भी लागू होती है । रस-वर्णन की भी सीमा होती है, उसके बाद. एक ही बात को (रूपकों, उपमाओं, वक्रतानों के बिना) सुनते-सुनते उसमें ऊब और शैथिल्य- सा आने लगता है । एक में अनेकता तथा क्षण-क्षणे नवीनता रमणीयता के लिए आवश्यक है। 'कुमारसम्भव' का रति-विलाप कुछ इसी प्रकार का है । ७. श्रङ्गी को भूल जाना :----जो मुख्य है उसको भूल जाना रस-दोष माना