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सिध्दांत और अध्ययन
 


त्पादक वा कार्य-कारण-भाव से उत्पत्ति होती है। नट की अनुकृति की सफलता से उत्पन्न सामाजिक के मन में चमत्कारजन्य आनन्द रस बन जाता है।

भट्टलोल्लट के मत की समीक्षा:-भट्टलोल्लट ने रस के लौकिक विषयगत पक्ष को महत्ता दी है। विभावन के लिए भी कुछ सामग्री अपेक्षित होती है,लोल्लट ने उसकी ओर संकेत किया है । कवि-कल्पना के भी नायक-नायिकाओं का कोई-न-कोई आधार लोक में होता है। इसमें रस की निराधारता तो नहीं रहती है किन्तु प्रश्न यह उपस्थित होता है कि मूल अनु कार्य पहले तो हगारी पहुँच से बाहर रहते हैं और दूसरे भाव हममें किस प्रकार की उत्पत्ति करते हैं । वे लज्जा या ईर्ष्या भी उत्पन्न कर सकते हैं? इसका उत्तर देने को लिए भट्टनायक की आवश्यकता थी। लोल्लट की व्याख्या में एक शास्त्रीय दोष तो यह निकाला गया है कि स्थायी भाव का उल्लेख भरत के सूत्र में नहीं है। उन्होंने स्थायी भाव को रस से पृथक् नहीं माना है,इसीलिए उन्होंने अपने सूत्र में उसका उल्लेख नहीं किया है । यह ऐसी वस्तु भी नहीं है जो पहले अपुष्ट रूप से रहती हो और पीछे से पुष्ट होकर रस का रूप धारण करे । विभावादि के बिना मूल आश्रय में स्थायी भाव हो ही नहीं सकता, फिर उनसे उसकी पुष्टि कैसी ?

इस सम्बन्ध में दूसरी आपत्ति यह उठाई गई है कि स्थायी भाव कार्य नहीं । यदि यह कार्य माना जाय तो विभावादि को निमित्त कारण माना जायगा । निमित्त कारण (जैसे कुम्हार ) के नष्ट होने पर कार्य बना रहता है किन्तु विभावादि के नष्ट होने पर रस भी नहीं रहता है। विभावादि कारक वा जनक कारण नहीं हो सकते और न वे ज्ञापक कारण ही हो सकते हैं । ज्ञापक कारण ( जैसे अँधेरे में रक्खे हुए घट का दीपक ) तो तभी हो सकता है जबकि ज्ञाप्य पहले वर्तमान हो । भट्टलोल्लट तो उत्पत्ति मानते हैं । यदि मान भी लिया जाय कि रस उत्पन्न होता है तो भी यह प्रश्न रहता है कि वह दर्शक में किस प्रकार संक्रमित होता है । वास्तव में बात यह है कि जहाँ रति होगी वहाँ रस होगा, रति यदि दुष्यन्त आदि में है तो सागाजिक में रस कहाँ से आ सकता है ? यदि यह कहा. जाय कि अनुकरण की सफलता से आता है तो अनुकार्य को देखे बिना अनुकरण को सफल या विफल किस प्रकार कहा जा सकता है ? अनुकार्य हमारी पहुँच से परे है। अनुकर्त्ता में उसका पारोप होता है । आरोपित रस दर्शकों में भी जिस चमत्कार को उत्पन्न करेगा उसमें आधार के मिथ्यात्व की कसक रहेगी । साहित्यदर्पणकार ने अनुकार्य में रस मानने में थोष बतलाते हुए कहा है कि अनुकार्य का