पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/१९७

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रस-निष्पत्ति-अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद १६१ समीक्षा : भट्टनायक के सम्बन्ध में अभिनव ने इतना ही कहा है कि उन्होंने काव्य में ऐसे दो नये व्यापारों को स्थान दिया है जिनका कि शास्त्र में कोई प्रमाण नहीं है। भावना या साधारणीकरण को मानते हुए भी अभिनव ने कहा है कि उसका काम व्यञ्जना या चर्वणा से पूरा हो जाता है और भोजकत्व स्वयं रस-निष्पत्ति ही है । एक तरह से दोनों को ही ध्वनन का व्यापार अर्थात् व्यञ्जना के अन्तर्गत माना है :- ___ 'यशायामपि भावनायां कारणांशे ध्वननमेव निपतति । भोगोऽपि न काव्यशब्दे क्रियते अपि तु ...... लोकोत्तरो ध्वमनव्यापार एव मूर्धाभिषिक्तः ।' __ --ध्वन्यालोक की टीका (पृष्ठ ७० ___४. अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद :--अभिनवगुप्त के अनुकूल रति आदि स्थायी भाव सहदय सामाजिकों के अन्तःकरण में वासना या संस्कार- रूप से अव्यक्त दशा में वर्तमान रहते हैं । काव्य में वर्णित विभावादि के पठन- श्रवण से अथवा नाटकादि के दर्शन से वे संस्काररूप स्थायी भाव उद्बुद्ध अवस्था को प्राप्त होकर वा अभिव्यक्त होकर विघ्नों के (जैसे वर्ण्य वस्तु की असम्भावना, वैयक्तिक भावों का प्राधान्य आदि) अभाव में सहृदयों के आनन्द का कारण होता है। सतोगुण के प्रभाव को अभिनवगुप्त ने भी माना है । इस प्रकार अभिनवगुप्त भी भट्टनायक की भांति इस अंश में सांख्यवादी है क्योंकि वेदान्त भी जो अभिनवगुप्त का दार्शनिकवाद है किसी अंश तक सांख्य की मान्यताओं को स्वीकार करता है। अभिनवगुप्त ने वासना को विशेष महत्त्व दिया है। वासना के अस्तित्व से काव्य-नाटक के आनन्दास्वादन की ग्राहकता आती है। बासनाशून्य मनुष्यों को तो साहित्यदर्पण कार ने लकड़ी के कुन्दों वा पत्थरों के समान संवेदनाशून्य कहा है। सामाजिक को ही रसास्वाद होता है, देखिए :- 'सवासनानां सभ्यानां रसस्यास्वादनं भवेत् । निर्वासनास्तु रङ्गान्त; काष्ठकुड्याश्मसन्निभाः ॥' -धर्मदत्त की उक्ति (प्राचार्य विश्वनाथ द्वारा साहित्यदर्पण के तृतीय परिच्छेद की नवीं कारिका की यत्ति में उद्धत) ये वासनाएँ या संस्कार प्राकृत भी होते हैं और नवीन भी । प्राकृत अथवा पूर्व जन्म के संस्कारों के सम्बन्ध में कविकुल-गुरु-कालिदास 'अभिज्ञानशाकुन्तल' में दुष्यन्त से कहलाते हैं कि सुन्दर वस्तुएँ देखकर और मीठे वचन सुनकर सुखी लोग भी जब उदास हो जायँ तब यह समझना चाहिए कि जन्मान्तर के प्रेम के स्थिर भाव (संस्कार) अज्ञातरूप से हमारे मन में जाग उठे हैं, देखिए :-