पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२१

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( १७ ) बढ़ाया बरन् पीछे के प्राचार्यों ( भामह, दण्डी, उद्भट आदि) का अनुकरण किया । ऐसी पुनरावृत्ति तो संस्कृत-साहित्य में भी होती रही। ध्वनिकार आनन्द- वर्धन और उनके टीकाकार अभिनवगुप्त तथा रसवादी धनञ्जय के पश्चात् अलङ्कारवादी जयदेवपीयूषवर्ष और उनके ठीकाकार अप्पय दीक्षित तेरहवीं शताब्दी में हुए । वे लोग भी पीछे लौटे (आर्यसमाजी तो मोक्ष से भी पुनरावृत्ति मानते हैं ) यदि केशव ने भी इतिहास की पुनरावृत्ति की तो कौन से आश्चर्य की बात है-'History repeats itself.' केशवदासजी ने रीति-सम्बन्धी दो ग्रन्थ लिखे--- (१) 'रसिक-प्रिया' (संवत् १६४२) और (२) 'कवि-प्रिया' (संवत् १६५२) । केशवदास अलङ्कार- वादी थे। उनका कथन था कि 'भूषण बिन न बिराजई कविता बनिता मित्र' ( कवि-प्रिया, पन्चम प्रकाल १) किन्तु उन्होंने कविता के लिए दोषों से रहित होना भी अत्यन्त अवश्यक माना है :- _ 'रजत रंच न दोषयुत, कविता यनिता मित्र । बूदक हाला होत ज्यों, गंगा तट अपवित्र ॥' -कवि-प्रिया (तृतीय प्रकाश, ४) 'कवि-प्रिया' में अलङ्कारों का क्षेत्र व्यापक माना है । उन्होंने दो प्रकार के अलङ्कार माने हैं-- (१) साधारण, जिसमें दुनिया के सारे वर्थ पदार्थ आगये हैं और (२) विशिष्ट, जिसमें कविता के अलङ्कार प्रागये हैं, ये ३७ माने है। "रसिक-प्रिया' में रसों का वर्णन है किन्तु उसमें शृङ्गार को ही महत्ता दी गई है । औरों का तो नामोल्लेख-मात्र ही है । शृङ्गार के उन्होंने प्रच्छन्न और प्रकाश नाम के दो भेद किये हैं। यह एक प्रकार से नई उद्भावना थी यद्यपि इसकी आवश्यकता में लोगों को सन्देह है। देव ने इसको पीछे से {अपनाया था। ... प्राचार्य शुल्कजी ने कविवर भूषण के भाई चिन्तामणि को रीतिकाल के प्रवर्तक होने का श्रेय दिया है । इसका रचना-काल संवत् १७०० माना जाता है। इन्होंने पीछे के प्राचार्यों ( रसवादी) के मार्ग का अनु- चिन्तामणि त्रिपाठी करण किया है । इनके दो ग्रन्थ-(१) कवि-कुल-कल्पतरू' .. (२)तथा 'शृङ्गार-मञ्जरी' उपलब्ध हैं । चिन्तामणि आचार्य विश्वनाथ और मम्मट दोनों से ही प्रभावित हैं। उन्होंने दोनों की ही परिभाषानों को मान्य' समझा है । चिन्तामणि द्वारा किया हुआ गुणों का वर्णन भी 'काव्य-प्रकाश' से प्रभावित है। दोनों प्राचार्यों से प्रभावित उनकी