पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२१०

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१७४ सिद्धान्त औरश्न ययन किसी भाव का कोइ विषय इस रूप में नहीं लाया जाता कि वह सामान्यतः सबके उसी भाव का श्रालम्बन हो सके तब तक उसमें रसोद्- बोधन की पूर्ण शक्ति नहीं पाती। इसी रूप में लाया जाना हमारे यहाँ 'साधारणीकरण' कहलाता है।" .. .. ..... - साहित्यालोचन (पृष्ठ २८८) इस पर आलोचना करते हुए बाबूजी कहते हैं :--- ___'साधारणीकरण से यहाँ यह अर्थ लिया गया है कि विभाव, अनुभाव श्रादि को साधारण रूप देकर सामने लाया जाय।...साधारणीकरण तो कवि अथवा भावक की चित्तवृत्ति से सम्बन्ध रखता है। चित्त के एकतान और साधारणी- कृत होने पर उसे सभी-कुछ साधारण प्रतीत होने लगता है।' -साहित्यालोचन (पृष्ठ २८८ और २८६) अत: यह मत भी ठीक नहीं है । यह उद्धृत मत भट्टनायक का माना जाता है, पर प्राचार्यों का अन्तिम सिद्धान्त तो यही है जो हमने माना है। हमारा हृदय साधारणीकरण करता है। ___ इस सम्बन्ध में मतभेद हो सकता है। शुक्लजी के मत को 'महस्य का भ्रम' कहना उचित नहीं है जबकि बाबूजी स्वयं स्वीकार करते हैं कि यह भट्टनायक के मत के अनुकूल है। इसके अतिरिक्त-'साधारण रूप देकर सामने लाया जाय'---यह कार्य तो कवि द्वारा ही होता है और जब वे लिखते हैं-'साधारण अवस्था में पहुँचने की शक्ति कुछ तो कवि-दृष्टि की विशेषता और कुछ अपने संस्कार दोनों यथातथ्य प्रदान करते हैं? ---तब वे कवि के कार्य को तो स्वीकार करते ही हैं । कवि का प्रभाव तो हम तक उसकी कृति द्वारा ही आता है । वास्तविक बात यह है कि . शुक्लजी के इस सिद्धान्त के निरूपण में उनके मन में बसे हुए तुलसीदासजी के राम झाँकते हए दिखाई पड़ते हैं जो सब के एक समान पालम्बन होते हैं । ऐसा, ज्ञात होता है कि वे आलम्बन का साधारणीकरण नहीं चाहते वरन् वे ऐसा पालम्बन ही चाहते हैं जो सबका आश्रय बन सके । शुक्लजी की प्रतिभा विषयगत है । बाबूजी विषयी ( यहाँ विषयी का अर्थ कामी नहीं है ) के हृदय को साधारणीकरण का श्रेय देते हैं। शुक्लजी का मत अभिनवगुप्त के सिद्धान्त से भी ज्यादा दूर नहीं है । 'सकल , सहृदयसंवादभाजा' (., अभिनवगुप्त के शब्द है-'हृदय- संवादात्मक सहृदयत्ववलात्') का भी यही अर्थ है।. अभिनवगुप्त भी विभावों का साधारणीकरण कम-से-कम सम्बन्धों से स्वतन्त्रता के रूप में मानते हैं। .... प्राचार्य शुक्लजी का मत :--भट्टनायक के मत की विवेचना करते हुए