पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२३

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नेह हानि हिय में नहीं भई दीप में जाइ ॥' -भाषा-भूषन ( दोहा १४५) __'भाषा-भूषन' चन्द्रालोक के किसी मयूख का अनुवाद नहीं है, कहीं. कहीं छाया अवश्य भागई है । बहुत-सी जगह यह स्वतन्त्र है । 'चन्द्रालोक' में रसों का वर्णन कुछ विस्तार के साथ अलङ्कारों के बाद में किया गया है किन्तु 'भाषा-भूषन' में प्रारम्भ में ही किया गया है । अलङ्कारों के वर्णन में कहीं 'चन्द्रालोक' की छाया है और कहीं नहीं है । सहोक्ति के उदाहरण में छाया है, 'भाषा-भूषन' का उदाहरण इस प्रकार है -'कीरति अरिकुल संग ही जलनिधि पहुँची जाइ' ( भाषा-भूषन, दोहा १२ )-तथा 'चन्द्रालोक' का उदाहरण इस प्रकार है-'दिगन्तमगमद्यस्यकीर्तिः प्रत्यर्थिभि सह' (चन्द्रालोक, ६०) । भाषा-भूषन में 'जलनिधि' है और चन्द्रालोक में 'दिगन्त' है । यथा- संख्या का उदाहरण लीजिए :--- 'करि अरि,मिन्न विपत्ति को गंजन, रंजन, भंग' --भाषा-भूषन ( दोहा, १४१) 'शन्न मित्रद्विषस्पक्ष जयरञ्जयभन्जय' -चन्द्रालोक (६२) 'भाषा-भूषन' में बहुत से उदाहरण स्वतन्त्र हैं जिनकी संख्या अधिक है। मतिराम ( जन्म-संवत् १६७४ ) के दो मुख्य गन्थ हैं--(१) 'रसराज' और (२) 'ललित ललाम' । 'रसराज' रस और नायिक-भेद का ग्रन्थ है और . 'ललित ललाम' अलङ्कार का । इनकी भाषा की सरसता मतिराम ने इनके उदाहरणों को सजीव बना दिया है। इनका किया हुमा नायिका का वर्णन बड़ा प्रसिद्ध है :- 'कु'दम को रंग फीको लगै, झलकै अति अंगनि चारु गोराई । आँखिन में अलसानि, चितौन में मंजु बिलासन की सरसाई ॥ को बिन मोल बिकात नहीं 'मतिराम लहै मुसकानि मिठाई । ज्यों-ज्यों निहारिये नेरे ह नैननि त्यौं-त्यौं खरी निकरै सो निकाई।।' -मतिराम-ग्रन्थावली ( रसराज ६) 'ललित ललाम' का एक उदाहरण लीजिए :- "और ठौर ते मेटि कछु, बात एक ही ठौर । अरनत परिसंख्या कहत, कवि कोविद सिरमौर ।। ...-मतिराम-ग्रन्थावली ( ललित ललाम २७३ )