पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२३६

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२०० सिद्धान्त और अध्ययन हमारे आचार्यों ने तो वाणी और अर्थ को काव्य का शरीर मानकर ररा को उसकी आत्मा माना है, इसलिए उन्होंने वैदर्भी, पाञ्चाली, रस से सम्बन्ध गौड़ी श्रादि रीतियों को गुणों के आश्रित माना और गुणों को भी रस का धर्म मानकर उनका सम्बन्ध ठीक काव्य की मात्मा से स्थापित कर दिया। मम्मटाचार्य का कथन है कि जिस प्रकार शौर्यादि आत्मा के ही गुण हैं, आकार के नहीं, उसी प्रकार माधुर्य आदि गुण भी काव्य की आत्मा के हैं :-- ___ 'पात्मन एव हि यथा शौर्यादयो नाकारस्य तथा रसस्यैव माधुर्यादयो गुणा न वर्णाना। -काव्यप्रकाश (८ १६६. की वृत्ति) , माधुर्य और अोज का वर्णों और पदों से भी उतना ही सम्बन्ध है जितना कि शूरता का एक सुगठित शरीर से । सगटित शरीर शूरता का द्योतक अवश्य होता है किन्तु शूरता एक मानसिक गुण है। इसी प्रकार यद्यपि माधुर्य की अभि- व्यक्ति 'ण' को छोड़ कर टवर्ग एवं महाप्राणरहित स्पर्श तथा वर्ग के अन्तिम वर्ण से युक्त वर्णों वाली समासरहित अथवा अल्प समारावाली कोमलकान्त पदावली द्वारा होती है, अोजगुण का प्रकटीकरण टवर्गप्रधान एवं वर्ग के पहले, दूसरे और तीसरे-चौथे वर्णों के संयुक्त वर्णों, जैसे----वरवख, भरत्थ, स्वच्छ, वग्धी, क्रुद्ध, युद्ध श्रादि द्वित्त और महाप्राण एवं लम्बे-लम्बे समास वाले पदों द्वारा होते हैं तथापि इनका सम्बन्ध पाठकों और श्रोताओं और कुछ-कुछ लेखकों और कवियों की भी मनोवृत्ति से है । इस प्रकार शैली कोई ऊपरी चीज नहीं जिसकी छाप वस्तु के ऊपर लगा दी जाय । जिस प्रकार प्रात्मा की अभिव्यक्ति के लिए शरीर प्रावश्यक है उसी प्रकार रस की अभिव्यक्ति के लिए शैली अवश्य है । शैली रस से सरिलष्ट है, केवल अध्ययन के लिए पृथक् की जा सकती है। ___ भारतीय समीक्षा में शैली का सम्बन्ध केवल भाषा से ही नहीं है वरन् अर्थ से भी है। इसीलिए गुण-दोष, शब्द और अर्थ दोनों के ही माने गये हैं। अलङ्कारों में भी शब्द और अर्थ दोनों को ही महत्त्व शैली का व्यापक दिया गया है। इसी दृष्टि से हम शैली के विभिन्न अङ्गों गुण का अध्ययन करेंगे और उनके आधार पर शैली के गुणों एवं प्रकारों का विवेचन करने का उद्योग करेंगे । इस वर्णन के पूर्व हम शैली के एक व्यापक गुण पर प्रकाश डाल देना उचित समझते हैं । यह है अनेकता में एकता और एकता में अनेकता। एकता के बिना अनेकता, विरोध, वैषम्य और अव्यवस्था का रूप धारण कर लेती है