पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२३८

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२०३ सिद्धान्त और अध्ययन है किन्तु मम्मट ने इन दशों को माधुर्य, पोज, प्रसाद तीन के ही भीतर लाने का प्रयत्न किया है, यद्यपि इस प्रयत्न में उनको प्रांशिक ही सफलता मिली है। पहली बात तो यह है कि इन दश गुणों की व्याख्या के सम्बन्ध में धर्म के तत्त्व की भाँति यही कहा जा सकता है कि 'नेको मुनिर्यस्यवचः प्रमाणम्' और मम्मट ने यदि वामन के बतलाये हुए दश गुणों की अन्विति तीन में करदी है तो उससे और प्राचार्यों के बतलाये हुए गुणों में नहीं होती। इसके अतिरिक्त इन दश या बीस गुणों में हमको शैली के बहुत से तत्त्व और प्रकार मिल जाते हैं। तीन गुण :--मुख्य रूप से तीन गुण माने जाते हैं-माधुर्य, अोज और . प्रसाद । इनका सम्बन्ध चित्त की तीन वृत्तियों से है-~(१) माधुर्य का ग्रुति, द्रवणशीलता या पिघलाने से है, (२) श्रोज का दीप्ति से अर्थात् उत्तेजना से और (३) प्रसाद का विकास से अर्थात् चित्त को खिला देने से है । प्रसाद का अर्थ ही है प्रसन्नता । प्रसाद तो सभी रचनाओं के लिए आवश्यक गुण है, इसीलिए जहाँ माधुर्य और भोज का तीन-तीन रसों से सम्बन्ध माना है वहाँ प्रसाद का सभी रसों से माना है। सूखे ईधन में अग्नि के प्रकाश आथवा स्वच्छ कपड़े में जल की झलक की भाँति प्रसादगुण द्वारा चित्त में एक साथ अर्थ का प्रकाश हो जाता है और चित्त को व्याप्त कर लेता है :- 'शुष्कन्धनाग्निवत्स्वच्छजलवसहसैव यः ॥' 'व्याप्नोत्यन्यत्प्रसादोऽसौ सर्वत्र विहितस्थितिः ।' -काव्यप्रकाश (८1७०,७१) प्रसाद का सम्बन्ध सब रसों के साथ मानना इस बात का द्योतक है कि अर्थ की स्पष्टता को शैली में कितना महत्त्व दिया गया है। मिलष्टत्व, अप्रयुक्त व अप्रतीतत्व आदि दोष भी अर्थ की स्पष्टता से ही सम्बन्ध रखते हैं। ध्वनिवादियों ने रस को असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गयध्वनि माना है। इसका भी यही अभिप्राय है कि रस में भी व्यङ्गधार्थ का शुष्क ईधन में अग्नि की भांति एक साथ अभिव्यक्त होना अभीष्ट है । प्रसादगुण माधुर्य और प्रोज दोनों के साथ रह सकता है इसीलिए उसके दो उपमान अग्नि और जल दिये गये हैं। अग्नि का सम्बन्ध अोज से है और जल का सम्बन्ध माधुर्य से । उसे (जल को) रस भी कहते हैं, विरोध माधुर्य और प्रोज का है। एक का सम्बन्ध चित्त की कोमल वृत्तियों से और दूसरे का सम्बन्ध कठोर वृत्तियों से है। जैसा कि ऊपर बतलाया है इन वृत्तियों के अनुकूल' इनका सम्बन्ध रसों से किया गया है। - माधुर्यगुण-सम्भोगशृङ्गार, करुणविप्रलम्भ और शान्त में क्रमशः बढ़ता