पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२५०

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२१४ सिद्धान्त और अध्ययन अभिधा द्वारा शब्द और अर्थ का सम्बन्ध किस प्रकार का है ? न्याय ने यह सम्बन्ध सांकेतिक माना है और इसे ईश्वरेच्छा पर निर्भर अभिधा रक्खा है-'अस्मात् पदादयमों बोद्धव्य इति ईश्वरेच्छा संकेतः शक्तिः ' (तर्कसंग्रह, शब्दप्रमाण)-इस पद से यह अर्थ लेना चाहिए, ऐसी ईश्वर की इच्छा को शक्ति कहते है । नव्य न्याय ने इच्छा शब्द को व्यापक बनाकर ईश्वरेच्छा में सीमित नहीं रक्खा, वरन् उसमें मनुष्येच्छा को भी शामिल किया है। न्याय के अनुकूल शब्द अनित्य है। वैयाकरण तथा मीमांसक शब्द और अर्थ दोनों को नित्य मानते हैं । व्यवहार में दोनों मतों में ( विशेषकर वैयाकरण और प्राचीन नैयायिकों में ) विशेष अन्तर नहीं है । नव्य न्याय ने मनुष्येच्छा को भी शामिल कर नये शब्दों के निर्माण की सम्भावना स्वीकार की है। इच्छा-मान को भी मानना आपत्ति से खाली नहीं क्योंकि शब्दों का निर्माण मनुष्यों के किसी समझौते पर नहीं निर्भर है। स्वाभाविक रूप से ही शब्द और अर्थ का मेल हो जाता है। जो लोग शब्द और अर्थ को नित्य मानते हैं वे लोग भाषा की परिवर्तनशीलता की उपेक्षा करते हैं। कालान्तर में शब्दों या अर्थ सङ्कोच (जैसे मृग पहले जानवर- मात्र को कहते थे, जैसे शाखा-मृग; पीछे से एक जानवर-विशेष के लिए प्रयुक्त होने लगा) और विस्तार (जैसे प्रवीण शब्द से पहले वीणा बजाने की निपुणता का वोध होता था, फिर उससे सब बात की निपुणता का बोध होने लगा। को प्राप्त हो जाता है और कभी-कभी बदल भी जाता है। आजकल .जब हम 'वागर्थाविध सम्पृक्ती' की बात कहते हैं तब हम शब्द की स्वाभाविक अर्थ बोधकता पर ही ध्यान देते हैं । उसके नित्यत्व और अनित्यत्व का प्रश्न हमारे मन से बाहर रहता है । शब्द और अर्थ को हम नित्य इसी अर्थ में कह सकते हैं कि मनुष्य में शब्द बनाने और उसके द्वारा अर्थ घोषित करने की शक्ति स्वाभाविक है और यह कालक्रम में विकसित हो जाती है। ... शब्द किसका वाचक होता है :--अर्थबोध में किसकी ओर संकेत किया १. नित्यता के सम्बन्ध में वैयाकरण और मीमांसकों का पारस्परिक · मतभेद है। वैयाकरण लोग चार प्रकार की वाणी मानते हैं--परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी । वैखरी वह है जिसे हम बोलते हैं। मध्यमा, पश्यन्ती. और परा उत्तरोत्तर अव्यक्त, सचम और भीतरी होती जाती हैं। धैखरी में वैयक्तिक विभेद भी होते रहते हैं । चैयाकरण मध्यमा, पश्यन्ती और परा को । ही नित्य मानते हैं। मीमांसक धैखरी को भी नित्य मानते हैं । धयाकरण स्फोट फ़ो मानते हैं। मीमांसक स्फोट नहीं मानते हैं।