पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२५४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


२१८ सिद्धान्त और अध्ययन है। रसव्यञ्जना में संस्कार अधिक काम करते हैं, बस्तु व्यञ्जना में परिस्थिति और कल्पना । यह मात्रा का ही प्रश्न है दोनों में दोनों ही सहायकों (अर्थात् कल्पना और संस्कार) की आवश्यकता पड़ती है। विशेष :-जो पाठकगण व्यञ्जना और ध्वनि से परिचित न हों वे कृपया व्यञ्जना और ध्वनि को पढ़ लेने के बाद इसे दुबारा पढ़लें । शुक्ल जी का मत समझने के लिए चिन्तामणि (भाग २, पृष्ठ १८३) पढ़िए । ____ शब्द का अर्थ अभिधा में ही सीमित नहीं रहता । वह उसके आगे भी जाता है । जहाँ मुख्यार्थ के बाध होने पर उससे ही सम्बन्धित दूसरा अर्थ रूढ़ि या प्रयोजन के आधार पर लगाया जाता है, वहाँ वह .....लक्षणा अर्थ लक्ष्यार्थ कहलाता है और जहाँ मुख्यार्थ में बाधा न होने पर या लक्षणा का कार्य पूरा हो जाने पर उसके अतिरिक्त दूसरा अर्थ भी ध्वनित होता है, वह व्यङ्ग घार्थ होता है । जिस शक्ति द्वारा लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है, उसे लक्षणा कहते हैं। काव्यप्रकाश में लक्षणा की व्याख्या इस प्रकार है :- "मुख्यार्थ बाधे तयोगे रूढितोऽथ प्रयोजनात् । अन्योऽर्थो लक्ष्यते 'यस्सा लक्षणारोपिता किया ।' -काव्यप्रकाश (२18) ' अर्थात् जहाँ अभिधा द्वारा अर्थ की सिद्धि में बाधा होने पर किसी रूढ़ि या प्रयोजन के प्राश्रित मुख्यार्थ से सम्बन्धित दूसरा पार्थ (प्रारोपित अर्थ) ग्रहण कर अवरोध दूर किया जाता है, वहाँ लक्षणा का व्यापार समझना चाहिए । इस प्रकार लक्षणा के व्यापार में तीन बात होती हैं-(१) मुख्यार्थ का बधि, (२) मुख्यार्थ से सम्बन्धित दूसरा अर्थ, ( ३ ) इस अर्थ का रूढ़ि या प्रयोजन के आधार पर लगाया जाना, जैसे :--- "फूले-फूले फिरत हैं, श्राज हमारो ब्याउ । तुलसी गाय बजाय के, देत काठ में पाउ॥' .. ब्याह करने वाला वास्तव में काठ में पैर तो नहीं देता है, वह तो चलता- फिरता रहता है (यह मुख्यार्थ में बाधा हुई) । काठ में पाँव देना बन्धन का द्योतक है, इसलिए काठ में पाव देना बन्धन में पड़ने के अर्थ में पाता है। यह मुख्य अर्थ से सम्बन्ध हुआ, यह अर्थ रूढ़ि या चलन के आधार पर लगाया गया है । मुहावरों में प्रायः ऐसे ही चलन की बात रहती है । लाक्षणिक प्रयोगों में प्रायः मूर्तिमत्ता प्राजाती है जिसके कारण प्रभाव अधिक पड़ता है।