पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२५५

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शब्द-शक्ति-लक्षणा बन्धन में पड़ने की अपेक्षा काठ में पैर पड़ जाना विशेष सजीव और चित्रोपम है। कविवर भिखारीदास का उदाहरण लीजिए :- 'फली सकल मनकामना, लूटेड अगनित चैन । आज अँचह हरि रूप सखि, भये प्रफुल्लित नैन ।' .-भिखारीदासकृत काव्यनिर्णय (पदार्थनिर्णय, २४) इसमें सभी प्रयोग लाक्षणिक हैं। वृक्ष फलते हैं, मनोकामना नहीं फलती, किन्तु पूर्ण होने में वह चमत्कार नहीं जो फलने में । इसमें कुछ समय पर्यन्त प्रतीक्षा की बात तथा बाहुल्य एवं पूर्णता के साथ सरसता, माधुर्य प्रादि के भाव भी व्यञ्जित हो जाते हैं, इसी प्रकार लूटने में जो भाव है वह 'प्राप्त करने में नहीं। लूटने में बाहुल्य, प्रसन्नता, उत्साह, शीघ्रता और लुटेरे का अनधिकार व्यजित हो जाता है ! 'अंचई' में जो बात है वह देखने में नहीं, उससे एक दम तृष्णा के साथ अन्तस्थल तक पहुँच जाने और तृप्ति की बात व्यजित होती है । प्रफुल्लित में खिले हुए फूल द्वारा हर्ष का मूत्तिमान् चित्र बन जाता है । लक्षणा का चमत्कार व्यञ्जना से ही निखरता है । लक्षणा अभिधा को दिवालिए से साहूकार बना देती है किन्तु उसे. व्यञ्जना के बैंक का ही सहारा लेना पड़ता है। लक्षणा का चमत्कार अभिधा के विरोध के दूर करने, उसकी सीमा बढ़ाने और उसको मूर्तता देने में है । भाषा के बहुत-से शब्द और मुहाविरे लक्षणा के ऊपर ही आश्रित होते हैं, सुराही की गर्दन, आलू की आँख, एहसान के भार से दबा हुग्रा, मुंह लाल, अपने पैर पर खड़ा होना आदि ऐसे ही प्रयोग हैं। रोज के व्यवहार में भी लक्षणा का प्रयोग होता है। जब ताँगा वालों पूछता है.---'बाबूजी सवारियाँ कहाँ है'—और उसके उत्तर में कहा जाता है कि सवारियां अमुक मुहल्ले में घर पर हैं, उस समय सवारी का अर्थ वाहन नहीं होता है। सवारी यदि घर पर ही हो तो बाहर से ताँगों ले जाने की प्रावश्यकता ही क्या ?. यह मुख्यार्थ में बाधा हुई । इसका तात्पर्य सवारी में बैठने वाली या वाले औरतें या आदमी हैं । यह मुख्यार्थ से सम्बन्धित अर्थ है । इसमें आधार- प्राधेय का सम्बन्ध है । आधार को ही प्राधेय मान लिया गया है । इस सम्बन्ध का आधार है, रूढ़ि या चलन । कुशल शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है, कुश लाने में समर्थ-('कुशलातीति कुशल :'.-कुश लाना योग्यता का द्योतक है)---किन्तु जब हम कहते हैं कि ये चित्रकला में कुशल हैं तो वहाँ मुख्यार्थ में बाधा पड़ती है। यहाँ लक्षणा द्वारा योग्यता या निपुणता का भाव लक्षित है, लक्षणा द्वारा मुख्यार्थ का बाध