पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२६

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( २२ ) विशेषकर राधाकृष्ण जैसे दिव्य दम्पत्तियों में माना है । सम्भव है यह भवित- भावना का फल हो । यहाँ वे भट्टलोल्लट से प्रभावित दिखाई पड़ते हैं- 'दम्पति उर कुरखेत बिधि बीज भीज रस-भाव' । देव ने सञ्चारियों के वर्गीकरण में परम्परा रो भेद प्रदर्शित किया है। उन्होंने सञ्चारियों के दो भेद किये हैं--(१) तन-सञ्चारी और (२) मन- सञ्चारी (शारीरिक और प्रान्तर)। तन-सञ्चारिपों में साहित्य-शास्त्र के सात्विक भाव रक्खे हैं और मन-सञ्चारियों में साधारण सञ्चारी । सात्विक भावों को अनुभावों में नहीं रखा है। देव ने 'भावविलास' में तो केवल ३६ अलङ्कार माने हैं किन्तु 'शब्दरसायन' में ४० मुख्य और ३० गीण, कुल मिलाकर ७० अलङ्कार माने हैं। देव ने शब्दशक्तियों पर भी विचार किया है और अभिधा से मुख्यता दी है। उसकी ! तुलना स्वकीया से की है और व्यञ्जना की परकीया से । वेव ने दोषों का वर्णन नहीं किया वरन् स्त्रियों और नायिका श्रादि के वर्गीकरण में विशेष रुचि दिखाई है । केशव ने दोषों का वर्णन किया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दी के प्राचार्यों में केशव के पश्चात् देव ने कुछ मौलिकता दिखाने और गम्भीर विवेचन का प्रयास किया है। . देव के पश्चात् प्राचार्य कवि तो बहुत से हुए (जैसे सुरति मिश्र, श्रीपति, सोमनाथ, ग्वाल कवि , लछिराम आदि ) किन्तु इन कवियों में जो ख्याति भिखारीदास, दुलह कवि और पद्माकर को मिली और भिखारीदास किसी को नहीं । भिखारीदास का 'काव्यनिर्णय'. (रचना- काल संवत् १८०३) रीति-शास्त्र का सर्वाङ्गपूर्ण ग्रन्थ है । यद्यपि इसका दृष्टिकोण 'काव्यप्रकाश' का ही है तथापि इसमें कुछ बातों की मौलिकता है । इसमें भाषा के ऊपर भी थोड़ा विवेचन' है। यद्यपि 'काव्यनिर्णय' का दृष्टिकोण प्रारम्भ में अलङ्कार-गुण आदि के सम्बन्ध में तो 'साहित्यर्पण' का-सा ही है क्योंकि रस को कविता का शरीर या मुख्य अङ्ग माना है। अलङ्कारों को प्राभूषण, गुणों को रूप और रङ्ग तथा दूषणों को कुरूपता का उत्पादक माना है तथापि साहित्यदर्पणकार की भाँति रस को प्रात्मा नहीं कहा गया है। यह कमी दासजी ने आगे चलकर गुणों के सम्बन्ध में पूरी १ 'अट्ठारह से तीनि को, सम्बत श्रास्विन मास । प्रन्थ काव्यनिरनय रच्यो, विजय दसमि दिन दास ॥ .... -भिखारीदासकृत काव्यनिर्णय ( मंगलाचरण-धर्णन ७)