पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२७३

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. १७ : अभिव्यञ्जनावाद एवं कलावाद शैली को महत्त्व देने वाले यूरोप में दो वाद हैं। एक अभिव्यञ्जनावाद ( Expressionism ) और दूसरा कलावाद ( Art for Arts Sake )। अभिव्यञ्जनावाद वस्तु की अपेक्षा अभिव्यक्ति को अधिक अभिव्यञ्जनावाद महत्त्व देता है (किन्तु वस्तु की उपेक्षा नहीं करता), कलावाद कला को नीति और उपयोगिता से स्वतन्त्र मानता है । यह दोनों वाद एक-दूसरे से मिले हुए भी एक-दूसरे से स्वतन्त्र हैं। यद्यपि क्रोचे की पुस्तक (Acsthetics) मेरे पास सन् १९१५ से थी तथापि अभिव्यञ्जावाद का पहिला परिचय सन् १९३५ से शुक्ल जी के 'काव्य में रहस्यवाद' ग्रन्थ से ही हुआ। इसके लिए मैं उनका कृतज्ञ है। स्वरूप :-प्राचार्य रामचन्द्रजी शुक्ल ने 'अभिव्यञ्जनावाद' का इस प्रकार परिचय दिया है :- १.......'कला या काव्य में अभिव्यञ्जना (Expression) ही सब कुछ है; जिसकी अभिव्यन्जना की जाती है वह कुछ नहीं । इस मत के प्रधान प्रर्वतक इटली के क्रोचे (Benedetto Croce) महोदय हैं। अभिव्यञ्जना- वादियों (Expressionists) के अनुसार जिस रूप में अभिव्यन्जना होती है उससे भिन्न अर्थ आदि का विचार कला में अनावश्यक है। --चिन्तामणि : भाग २ (काव्य में रहस्यवाद, पृष्ठ ६५) ___२. 'अभिव्यजनाबाद अनुभूति या प्रभाव का विचार छोड़ केवल वाग्वैचित्र्य को पकड़कर चला है; पर वाग्वैचित्र्य का हृदय की गम्भीर वृत्तियों से कोई सम्बन्ध नहीं। वह केवल कुतूहल उत्पन्न करता है।' -चिन्तामणि : भाग २ (काव्य में रहस्यवाद, पृष्ठ ६७) इस वाद का विस्तृत और बहुत-कुछ शुद्ध रूप हमको प्राचार्य शुक्लजी के इन्दौर वाले भाषण ('काव्य में अभिव्यञ्जनावाद' के नाम से चिन्तामणि : भाग २ में संग्रहीत) में जो सम्मेलन को साहित्य परिषद के सभापति के प्रासन से दिया गया था, मिलता है । क्रोचे कला-सम्बन्धी ज्ञान को स्वयंप्रकाशज्ञान ( Intuition ) कहा है, स्वयंप्रकाशज्ञान की उत्पत्ति कल्पना में होती है । कल्पना के कार्य और स्वयंप्रकाशज्ञान तथा अभिव्यञ्जनावाद के सम्बन्ध में शुक्लजी क्रोचे का मत इस प्रकार देते हैं :-